‘उस हार के बाद मैंने अपने कमरे से बाहर नहीं निकला, ये इतना निराशाजनक था कि मैंने दो दिन कुछ नहीं किया। उसके बाद खुद को अगले टूर्नामेंट के लिए तैयार करना मुश्किल था’ ये शब्द हैं महान बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर के और ये निराशाजनक हार थी 2007 के वर्ल्ड कप के पहले ही दौर से टीम इंडिया के बाहर होने की। Also Read - Wisden Almanack's ODI cricketer of the 2010s: Virat Kohli बीते दशक के सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटर, सचिन तेंदुलकर-कपिल देव भी सम्मानित

करीब 10 साल पहले 23 मार्च 2007 को टीम इंडिया श्रीलंका के हाथों हारकर वर्ल्ड कप के पहले ही दौर से बाहर हो गई थी। उस वर्ल्ड कप में टीम इंडिया को अपने पहले ही मैच में बांग्लादेश के हाथों हार झेलनी पड़ी थी और उसके बाद श्रीलंका के हाथों मिली हार ने वर्ल्ड कप के पहले ही दौर से टीम इंडिया का सफर निराशाजनक ढंग से खत्म कर दिया था। सचिन तेंदुलकर ने इसे अपने करियर का सबसे निराशाजनक दौर करार देते हुए कहा है कि उस हार के बाद उनके मन में संन्यास लेने का ख्याल तक आया था। Also Read - COVID-19: सचिन तेंदुलकर को अस्पताल से मिली छुट्टी; आइसोलेशन में रहकर करेंगे आराम

मिड डे को दिए एक इंटरव्यू ने अपने करियर के उस सबसे निराशाजनक दौर के बारे को लेकर अपने अनभुव, तकलीफें और विचार साझा किए हैं। आइए जानें उस निराशाजनक दौर को लेकर सचिन ने और क्या कहा है। Also Read - ICC World Cup Super League points table: द. अफ्रीका को हराकर दूसरे स्‍थान पर पहुंचा पाकिस्‍तान, भारत की हालत पतली

मन में आया था संन्यास का ख्यालः
सचिन ने कहा कि 2007 के विश्व कप में मिली करारी हार ने उन्हें बहुत निराश किया था। उन्होंने कहा, ‘मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस खेल ने मुझे मेरे करियर के सबसे अच्छे दिन दिखाए वही अब जिंदगी के सबसे खराब दिन दिखा रहा था। मुझे बहुत बुरा लगा और मेरा मनोबल गिर गया, मैं कुछ दिन तक घर से बाहर भी नहीं निकला।’ यह भी पढ़ें: सचिन तेंदुलकर ने बताई क्रिकेट को अलविदा कहने की वजह

मेरे करियर का सबसे निराशाजनक दौर था
सचिन ने 23 मार्च 2007 को श्रीलंका के हाथों मिली हार के साथ ही वर्ल्ड कप में टीम इंडिया के बाहर होने को अपने करियर के सबसे निराशाजनक दौर में से एक करार दिया। सचिन ने कहा, मैं इसे (23 मार्च 2007) को अपने करियर के सबसे खराब दिनों में से एक करार दूंगा। जब आपको लगता है कि आप जीतेंगे लेकिन आप हार जाते हैं। आप बुरा महसूस करते हैं। जैसे कि जोहांसबर्ग टेस्ट (1997) में हुआ था, जब हमने दक्षिण अफ्रीका को आउट कर लिया था लेकिन बारिश हो गई, बारबाडोस टेस्ट (1997), जब मैं कप्तान था और 1996 के विश्व कप सेमीफाइनल में श्रीलंका के हाथों मिली हार। ये ऐसे मैच हैं जब आपको बुरा लगता है। 2007 का विश्व कप हमारे लिए अच्छा नहीं रहा था। हम बांग्लादेश के बाद श्रीलंका से हार गए। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि हम बांग्लादेश से हार सकते हैं। लेकिन ये क्रिकेट की अनिश्चितताओं का एक और उदाहरण थी।

ग्रेग चैपल थे टीम की दुर्दशा के जिम्मेदार
सचिन ने भारतीय टीम के उस खराब प्रदर्शन के लिए तब के टीम कोच रहे ग्रेग चैपल को जिम्मेदार ठहराया था। सचिन ने कहा, ‘हां, शत प्रतिशत ग्रेग इस असंतुलन के जिम्मेदार थे, और मैंने जो कहा था उस पर कायम हूं।’ सचिन ने कहा कि जो बल्लेबाज दक्षिण अफ्रीका दौरे में ओपनिंग कर रहे थे वे वर्ल्ड कप में मिडिल ऑर्डर में खेल रहे थे। टीम में कई तरह के बदलाव किए गए। अगर मुझे वर्ल्ड कप में नंबर 4 पर बल्लेबाजी करनी थी तो मैं साउथ अफ्रीका में ओपनिंग क्यों कर रहा था? और उनके (ग्रेग) पास इसका कोई जवाब भी नहीं था। जो भी हो रहा था ठीक नहीं था।

विव रिचर्ड्स की फोन कॉल ने बदली जिंदगी
2007 के वर्ल्ड कप हार से निराश सचिन जब संन्यास तक लेने की सोच रहे थे तो एक दिन महान कैरेबियाई बल्लेबाज विव रिचर्ड्स ने सचिन को कॉल किया। विव ने सचिन से करीब 45 मिनट बात की। सचिन के अनुसार इस कॉल ने उनकी जिंदगी बदल दी। विव ने सचिन से क्रिकेट के उतार-चढ़ाव के बारे में बात की। विव ने जोर देकर कहा कि ‘तुम अभी संन्यास नहीं लोगो।’ विव को सचिन के एक दोस्त से पता चला था कि वह संन्यास लेने के बारे में सोच रहे थे। यह भी पढ़ें: संजय मांजरेकर ने ली एक पुरानी तस्वीर पर सचिन की चुटकी, लेकिन उड़ गया उनका ही मजाक

फिर से मैदान में लौट आए सचिन
विव की कॉल से सचिन का टूटा हुआ मनोबल वापस लौटा और वह कहते हैं कि जब आपके हीरो आपको कॉल करते हैं तो इससे बड़ा अंतर पड़ता है। मैंने हमेशा से विव और सुनील गावस्कर की तरफ देखा। इसके बाद मैंने सोचा, ठीक है, मैं इन विचारों से बाहर निकलूंगा और मुंबई वापस लौटते ही फिर से प्रैक्टिस शुरू करूंगा। मेरे भाई अजित ने 2011 के वर्ल्ड कप के बारे में मुझसे बातें करते हुए कहा कि ये ट्रॉफी मेरे हाथों में हो सकती है। मैंने सुबह 5.30 बजे प्रैक्टिस की और फिर दोपहर में भी अभ्यास किया।

2007 की टीम अच्छी थी
सचिन ने कहा कि 2007 की टीम एक अच्छी टीम थी लेकिन उसे ठीक ढंग से हैंडल नहीं किया गया। सचिन ने कहा कि ये वही खिलाड़ी थे जिनके प्रदर्शन के बल पर बाद में भारत टेस्ट क्रिकेट में नंबर वन टीम बना और 2011 का वर्ल्ड कप जीता।