नई दिल्ली: ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ मौजूदा टेस्ट सीरीज के तीसरे मैच में भारत को पहली पारी में 292 रनों की बढ़त मिली थी, लेकिन टीम के कप्तान विराट कोहली ने विपक्षी टीम को फॉलोऑन नहीं खिलाया. एक्सपर्ट्स उनके इस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं. उनका कहना है कि मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड की पिच पर इतनी बढ़त के साथ फॉलोऑन देना सही फैसला होता. खासकर इसलिए भी कि भारतीय टीम को पहली पारी में ज्यादा गेंदबाजी नहीं करनी पड़ी थी. दूसरी पारी में भारतीय बल्लेबाजों के खराब प्रदर्शन और मैच के अंतिम दो दिन बारिश की आशंका के चलते भी कोहली के फैसले पर सवाल उठ रहे हैं. यह बात सच है एमसीजी की असमान उछाल वाली पिच पर ऑस्ट्रेलिया के लिए दूसरी पारी में 300 रनों के स्कोर तक पहुंचना मुश्किल होता. लेकिन एक्सपर्ट्स की राय से अलग, विराट कोहली के इस फैसले को जानने के लिए आपको 17 साल पीछे जाना होगा. 2001 में कोलकाता में भारत-ऑस्ट्रेलिया ऐतिहासिक टेस्ट मैच की यादें ताजा करनी होंगी. सच्चाई यह है कि 2001 में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए टेस्ट मैच के बाद विपक्षी टीमों को फॉलोऑन खिलाने का चलन बेहद कम हो गया है.

56.70 फीसदी मामलों में ही फॉलोऑन
इस ऐतिहासिक टेस्ट मैच से पहले के बीस साल यानी 1981-2001 के बीच 77 बार ऐसे मौके आए जब टीमें विपक्षी टीम को फॉलोऑन खेलने को कह सकती थी. इनमें से 70 अवसरों पर बढ़त हासिल करने वाली टीम ने ऐसा ही किया. यानी करीब 90 फीसदी मामलों में पीछे रहने वाली टीम को फॉलोऑन खेलना पड़ा. लेकिन इसके बाद के वर्षों में यह अनुपात कम हो कर 56.70 फीसदी रह गया है. इसका मतलब है कि कोलकाता टेस्ट के बाद से फॉलोऑन खिलाने का चलन करीब 35 फीसदी कम हो गया है.

300 से कम की लीड हो तो हिचकते हैं कप्तान
कोलकाता टेस्ट के बाद से फॉलोऑन के मामले में एक और बदलाव आया है. अब टीमों के कप्तान 300 रनों से कम की लीड हो तो फॉलोऑन खिलाने का विकल्प कम अपनाते हैं. इस टेस्ट के बाद से साल 2017 के अंत तक 83 बार ऐसे मौके आए जब एक टीम के पास 300 रनों से कम की लीड थी और वे विपक्षी टीम को फॉलोऑन खिला सकती थीं, लेकिन वास्तव में केवल 34 यानी करीब 41 फीसदी मौकों पर ही बढ़त वाली टीम ने फॉलोऑन खिलाने का फैसला लिया. 2001 से पहले के 20 वर्षों में 57 मैचों में ऐसी परिस्थिति बनी कि टीम के पास 300 रनों की कम लीड थी. इनमें से 50 यानी करीब 88 फीसदी मौकों पर उन्होंने फॉलोऑन खिलाने का फैसला किया था.

वहीं, 300 रनों से ज्यादा की लीड हो तो फॉलोऑन खिलाने का अनुपात करीब दोगुना हो जाता है. आंकड़ों को देखें तो कोलकाता टेस्ट के बाद से पिछले साल के अंत तक 58 ऐसे मौके आए जब टीमों के पास 300 रनों से ज्यादा की लीड थी. इनमें से 46 अवसरों पर दूसरी टीम को फॉलोऑन खेलना पड़ा.

फॉलोऑन नहीं खिलाने पर जीत की ज्यादा संभावना
पहले यह माना जाता था कि फॉलोऑन नहीं खिलाने से बढ़त हासिल करने वाली टीम की जीत की संभावना कम हो जाती है. लेकिन हाल के वर्षों के आंकड़े इसकी गवाही नहीं देते. कोलकाता टेस्ट के बाद से 141 टेस्ट मैच ऐसे हुए हैं जिनमें फॉलोऑन की गुंजाइश थी. इनमें से 19 मुकाबले ही ड्रॉ हुए हैं. इन 19 ड्रॉ मुकाबलों में पांच ऐसे हैं जिनमें फॉलोऑन नहीं खिलाया गया और मुकाबला ड्रॉ हुआ. वहीं, 141 में से 80 मैचों में फॉलोऑन खिलाया गया और मैच ड्रॉ पर खत्म हुआ. फॉलोऑन नहीं खिलाने वाली टीमें करीब 92 फीसदी मैचों में जीत हासिल करने में सफल रहे हैं. वहीं, फॉलोऑन खिलाने के बाद करीब 80 फीसदी मैचों में ही बढ़त हासिल करने वाली टीम जीतनें में कामयाब रही है.

क्या हुआ था 2001 के कोलकाता टेस्ट में
ईडन गार्डन्स में खेले गए इस मुकाबले में ऑस्ट्रेलिया ने टेस्ट जीतकर पहले बैटिंग चुनी और पहली पारी में 445 रन बनाए. जवाब में भारत की पहली पारी 171 रनों पर सिमट गई. ऑस्ट्रेलिया को 274 रनों की बढ़त मिली और उसने भारत को फॉलोऑन खिलाने का फैसला किया. दूसरी पारी में भी ओपनर शिवसुंदर दास, सचिन तेंदुलकर और सौरव गांगुली लंबी पारी नहीं खेल पाए. लेकिन वीवीएस लक्ष्मण के साथ राहुल द्रविड़ ने मोर्चा संभाला. इन दोनों ने पांचवें विकेट के लिए 376 रनों की साझेदारी की. लक्ष्मण ने 281 रनों की ऐतिहासिक पारी खेली जबकि द्रविड़ ने 180 रन बनाए. भारत ने अपनी दूसरी पारी 657/7 रन बनाकर घोषित की और ऑस्ट्रेलिया को जीत के लिए 384 रनों का लक्ष्य मिला लेकिन हरभजन सिंह की बेहतरीन गेंदबाजी के सामने कंगारू टीम 212 रनों पर सिमट गई.

2001 से पहले के दौर में टेस्ट मैचों में स्कोरिंग रेट कम होता था. टेस्ट मैच कम खेले जाते थे जिससे गेंदबाजों पर वर्कलोड कम होता था. मौजूदा दौर में हालात बदल गए हैं. अब पूरे साल अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेली जाती है और गेंदबाजों के लिए लगातार दो पारियों में बॉलिंग करना मुश्किल होता है. टेस्ट क्रिकेट में अब तक केवल तीन ऐसे मौके आए हैं जब फॉलोऑन खेलने वाली टीम अंत में जीत हासिल कर सकी है. कोलकाता टेस्ट इन सब में खास है क्योंकि इसने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के स्वरूप को बदल डाला.