बिहार में कांग्रेस पार्टी बिना संगठन के ही लोकसभा चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है. सुनकर थोडा अजीब जरूर लगता है, लेकिन बिना संगठन के कांग्रेस बीजेपी जेडीयू को टक्कर कैसे देगी, ये भी बडा सवाल है. हालांकि, पार्टी के नेताओं का दावा है कि पार्टी हर परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार है. Also Read - Driving License Latest Update: अब चुटकियों में बन जाएगा ड्राइविंग लाइसेंस, बदल गए हैं नियम, जानिए

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दरअसल बिहार कांग्रेस अपने कारनामों के लिए हमेशा सुर्खियों में रहा है. इस बार भी मामला कुछ अलग और रोचक है. पूर्व अध्यक्ष अशोक चौधरी के पार्टी छोड़ने के बाद आलाकमान ने सभी स्तर पर संगठन को भंग कर दिया था. पार्टी के सीनियर लीडर कौकब कादरी को 27 सितंबर 2017 को तात्कालिक रूप में प्रभारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी. ये उम्मीद की जा रही थी कि लोकसभा चुनाव को देखते हुए जल्द ही पूर्णकालिक अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ संगठन का पुनर्गठन भी किया जाएगा, लेकिन फिलहाल कांग्रेस आलाकमान इस मूड में नही दिख रहा. कौकब कादरी भी कामचलाउ व्यवस्था के बीच चल रही पार्टी की गतिविधियों सें संतुष्ट नजर आते हैं. कादरी कहते हैं कि बिना पूर्ण संगठन के ही बिहार यूनिट ने किसानों के मुद्दे पर जिस तरह आंदोलन चलाया है, वो आपने आप में काबिले तारीफ है. Also Read - Bihar Latest News: मुंगेर जिले के एक स्‍कूल में कोरोना वायरस संक्रमण फैला, 22 छात्र और 3 शिक्षक Covid-19 से पॉजिटिव

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कादरी भले ही अपने कार्यकाल को लेकर फील गुड में हों, लेकिन कांग्रेस सांसद अखिलेश सिंह वर्तमान सांगठनिक स्वरूप से खुश नहीं हैं. बीते दिनों एक कार्यक्रम के दौरान अखिलेश सिंह ने खुले मंच से बिहार कांग्रेस के कमजोर संगठन का जिक्र किया था. अखिलेश सिंह ने कहा था कि वो वर्तमान संगठन की व्यवस्था से खुश नहीं हैं. बिहार में कांग्रेस की संगठन की स्थिति बीजेपी आरजेडी और जेडीयू से खराब है. अखिलेश सिंह ने आलाकमान से चुनाव को देखते हुए जल्द से जल्द मामले में पहल करने की अपील की है. दरअसल अखिलेश सिंह के इस बयान के पीछे कई तथ्य छिपे हुए हैं.

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कांग्रेस के पास अभी न तो स्थायी जिलाध्यक्ष हैं और न ही प्रखंड अध्यक्ष. पहले से पद पर बने जिलाध्यक्षों और प्रखंड अध्यक्षों को अशोक चौधरी का आदमी बताया जाता है. पार्टी फिलहाल उन्हीं से काम चला रही है. इतना ही नहीं, परफार्मेंस के आधार पर उन्हें कभी भी हाटाये जाने की चेतावनी प्रभारी अध्यक्ष की ओर से लगातार दी जा चुकी है. ऐसे में जब तक नये संगठन और अध्यक्षों के नाम की घोषणा नहीं हो जाती, तब तक पुराने खुद को असुरक्षित महसूस करेंगे.

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हालांकि, पार्टी के पूर्व अध्यक्ष अनिल शर्मा भी वर्तमान सांगठनिक व्यवस्था से संतुष्ट हैं. अनिल शर्मा कहते हैं कि कांग्रेस और महागठबंधन बिलकुल मजबूत है. बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का बिहार दौरा इस बात को और पुख्ता करता है, क्योंकि बिहार में उन्हें कड़ी चुनौती मिलने वाली है.

वर्तमान में पीसीसी के पास एक स्थापना प्रभारी और 20 मीडिया पैनलिस्ट और प्रवक्ता हैं. पार्टी इन्हीं लोगों से चल रही है. नये अध्यक्ष और नये संगठन को लेकर होने वाले विलंब के पीछे की वजह पार्टी का अंदरूनी विवाद भी बताया जा रहा है. पार्टी आलाकमान को ये डर है कि वर्तमान संगठन में फेरबल हुआ तो पार्टी चुनाव के वक्त आंतरिक विवादों में उलझ कर रह जाएगी जिसका खामियाजा लोकसभा चुनाव के वक्त पार्टी को भुगतना पड़ सकता है. लेकिन इसके साथ सवाल ये भी है कि क्या इसी काम चलाउ व्यवस्था के बीच कांग्रेस देश की सबसे बड़ी और ताकतवर पार्टी को चुनौती देने की तैयारी कर रही है.