पंजाब में पिछले दो विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने वाली शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी के लिए इस बार का चुनाव इतना आसान नहीं है। कह सकते हैं कि पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को इस बार अब तक के अपने चुनावी जीवन का सबसे कठिन चुनाव का सामना करना पड़ा। इस बार आम आदमी पार्टी के पंजाब चुनाव में मुकाबले को त्रिकोणीय करने के बाद से ही अकाली दल का आत्मविश्वास डगमगाने लगा था। वहीं, पंजाब के लोगों की सरकार के प्रति नाराज़गी ने भी इस बार शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी के लिए जीत काफी मुश्किल बना दी है। बीजेपी इस चुनाव में काफी लो प्रोफाइल रही। उसने पंजाब चुनाव के नतीजों के लिए कोई बड़ा दावा भी नहीं किया।

नाखुश जनता

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गंठबंधन का 10 साल से शासन है। यहां में 1.98 करोड़ वोटर हैं। इनमें करीब 22 फीसदी नए वोटर हैं, जिन्होंने पहली बार वोट किया। ये युवा हैं और सरकार और चुनाव को लेकर उनकी सोच अलग थी। इनके सामने दस साल तक एक ही गंठबंधन की सरकार की सफलता-विफलता की कहानियां थीं। पंजाब के युवा इस बार दूसरी सरकार को मौका दे सकते हैं। वहीं एनआरआई की बात की जाए तो ज्यादातर इस बार आम आदमी पार्टी के साथ खड़े नज़र आए। इन्होंने सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ जमकर प्रचार किया, पंजाब में रह रहे अपने परिवार-रिश्तेदार वालों को इस पार्टी के खिलाफ वोट देने के लिए राज़ी किया। इसके अलावा, इस सरकार के लिए भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, ड्रग्स का नासूर और खराब कानून-व्यवस्था, ऐसे पहलू साबित जिन्होंने अकाली दल को ढलान वाली स्थिति में ला दिया है।

ड्रग्स की समस्या दूर करने में नाकाम

पंजाब में ड्रग्स की समस्या इस बार चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बनकर उभरा था लेकिन अकाली दल यही कहता रहा कि ड्रग्स समस्या को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता रहा है। लेकिन फिर भी ड्रग्स की समस्या अकाली दल की गले की फांस बनी हुई। इस मुद्दे ने चुनाव में और किसी भी मुद्दे की तुलना में बादल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया। अगर इस चुनाव में शिरोमणि अकाली दल-बीजेपी गठबंधन हारा तो ड्रग्स की समस्या और उसपर पंजाब के लोगों का गुस्सा एक बड़ा कारण रहेगा।

‘बादलों’ के ख़िलाफ गुस्सा

इस चुनाव में जनता के मन में बादलों के ख़िलाफ काफी गुस्सा है। इसके कई कारण हैं। बादल परिवार के कारोबारी हित बस संचालन से लेकर होटल और केबल टेलीविजन जैसे अहम व्यवसायों से जुड़े हैं। अपनी संपत्ति को छुपाने के लिए उन्होंने कोई कोशिश नहीं की। इनमें से कुछ तो विरासत में मिली लेकिन संपत्ति का बड़ा हिस्सा अकाली सरकार के कार्यकाल के दौरान भी जुटा। संपत्ति का दिखावा ऐसे वक्त पर किया गया, जब राज्य में बेरोज़गारी की समस्या की वजह से लाखों लोग गरीबी से जूझ रहे थे। वोटर इस बात से काफी नाराज़ थे। 10 साल बाद इस बार पंजाब की जनता नई पार्टी को मौका दे सकती है।

बैकफुट पर बीजेपी

इस बार बीजेपी पंजाब में काफी पीछे छूट गई है। प्रचार में भी बड़े नेता नहीं दिखे। पीएम मोदी ने एक-दो ही रैली को संबोधित किया। शायद पार्टी को इस बात का अंदाज़ा पहले ही हो गया कि पंजाब में चुनाव परिणाम उनके पक्ष में नहीं आएंगे, इसीलिए पूरे चुनाव के दौरा वो लो-प्रोफाइल रही। बीजेपी ने 23 उम्मीदवार उतारे हैं। बीजेपी के कमज़ोर पड़ने से अकाली दल को काफी नुकसान पहुंच सकता है।

पिछले चुनावों के नतीजे     

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में पंजाब में 40 सालों का रिकॉर्ड टूटा था। यहां इतने सालों से कोई भी पार्टी दूसरी बार सरकार नहीं बना पाती थी लेकिन शिरोमणि अकाली दल ने बहुमत पाकर राज्य की सत्ता फिर से हासिल कर ली थी। अकाली दल को पंजाब विधानसभा की कुल 117 सीटों में से 56 सीटें हासिल हुई थीं। कांग्रेस को 46 और बीजेपी के हिस्से में सिर्फ 12 सीटें ही आई थीं। उससे पिछले विधानसभा चुनाव में भी शिरोमणि अकाली दल की झोली में सबसे ज्यादा 48 सीटें आई थीं। कांग्रेस उससे बहुत कम अंतर से पीछे थी, उसके पास 44 सीटें आई थीं।