दिल्ली की राजौरी गार्डन विधानसभा सीट पर 9 अप्रैल को उपचुनाव करवाए जाएंगे। इस सीट पर पहले आम आदमी पार्टी विधायक जरनैल सिंह काबिज़ थे, जिनके इस्तीफे के बाद ये सीट खाली हो गई थी। हालांकि ये सीट सिर्फ एक महीने से ही खाली है। ये उपचुनाव न सिर्फ आम आदमी पार्टी, बल्कि बीजेपी और कांग्रेस के लिए भी साख़ का सवाल बना हुआ है।

क्यों खाली हुई राजौरी गार्डन विधानसभा सीट

राजौरी गार्डन से 2015 में चुने गए आम आदमी पार्टी  के विधायक जरनैल सिंह ने पिछले महीने इस्तीफा दे दिया था। सिंह पंजाब में लंबी क्षेत्र से विधानसभा चुनावों में उतरे थे। इस सीट पर सिंह का सामना सीधे-सीधे सिंह बादल और वर्तमान सी.एम. कैप्टन अमरेन्द्र सिंह से हुआ। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी के विधायक जरनैल सिंह इतनी बुरी तरह हारे कि वो अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए।

‘आप’ की अग्नि परीक्षा

राजौरी गार्डन  सीट पर उपचुनाव आम आदमी पार्टी के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। पंजाब चुनाव के नतीजों ने तो उसकी उम्मीदें तोड़ दीं, अब पार्टी नहीं चाहेगी कि एमसीडी चुनाव के लिए उनका मनोबल कम हो। जिसके लिए ये ज़रूरी है कि अपने दो साल के काम-काज के दम पर उसे ये सीट जीतनी होगी। इस सीट पर आम आदमी पार्टी से राघव चड्ढा की उम्मीदवारी की चर्चा है लेकिन पार्टी ने अभी कोई फैसला नहीं किया है।

कांग्रेस को चाहिए अपनी परंपरागत सीट पर एक बार फिर कब्ज़ा

राजौरी गार्डन कांग्रेस की परंपरागत सीट रही है। 1993 से 2013 तक लगातार 20 साल यहां से कांग्रेस के ही विधायक रहे। लेकिन 2013 में सिरसा ने कांग्रेस के इस ख़्वाब को तोड़ दिया और इसके बाद 2015 में जरनैल सिंह ने कांग्रेस की बची खुची उम्मीद को भी खत्म किया। हालांकि उपचुनाव के लिए एक बार फिर कांग्रेस को उम्मीद हुई है कि शायद वो अपनी परंपरागत सीट को हासिल कर सके। कांग्रेस ने मिनाक्षी चंदीला को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। मीनाक्षी पूर्व विधायक और मौजूदा पार्षद दयानंद चंदीला की बहू हैं। मीनाक्षी ने 2015 का विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस के टिकट पर लड़ा था जिसमें वो तीसरे नंबर पर रही थीं।

बीजेपी-अकाली दल के बीच फंसा ‘पंजाब’ का पेंच

राजौरी गार्डन की सीट लेकर भाजपा और अकाली दल के रिश्तों के बीच खटास पड़ने की संभावना है। दरअसल ये पंजाबी बहुल इलाका है। बीते दो विधानसभा चुनाव यहां से अकाली नेता मनजिंदर सिंह सिरसा लड़ रहे थे। अकाली नेता सिरसा को भाजपा ने ये सीट दी थी। दिल्ली में भाजपा और अकाली दल मिलकर चुनाव लड़ते हैं। दिल्ली में नगर निगम और विधानसभा की कुछ सीटें भाजपा अकाली दल के लिए छोड़ती रही है। बदल में दिल्ली में अकाली दल सभी सीटों पर भाजपा के उम्मीदवारों का समर्थन करता है। इस बार पंजाब के चुनावों में अकाली दल और भाजपा गठबंधन की जिस तरह से हार हुई है, उसे लेकर भाजपा के दिग्गज नेता काफी परेशान हैं क्योंकि भाजपा पंजाब में अपनी हार के लिए अकाली दल को जिम्मेदार मानती है। 21 मार्च इस चुनाव के लिए नामांकन का आखिरी दिन है, देखना होगा दोनों पार्टी कैसी समझ के साथ यहां अपना उम्मीदवार उतारती है।