AI की रफ्तार से बढ़ी बिजली की मांग, 2030 तक डेटा सेंटर्स का खर्च होगा दोगुना
AI की बढ़ती मांग से डेटा सेंटर्स की बिजली खपत तेजी से बढ़ रही है. ऐसे में अनुमान लगाया जा रहा है कि बिजली खर्च 2030 तक दोगुना हो सकता है.
AI Data Centers (Image: AI)
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहा है. इसका असर अब बिजली की खपत पर भी साफ दिखाई देने लगा है. गार्टनर की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 में डेटा सेंटर्स की बिजली मांग 26.4 फीसदी तक बढ़ सकती है. अनुमान है कि बिजली खपत 2025 के 447 टेरावाट घंटे से बढ़कर 565 टेरावाट घंटे तक पहुंच जाएगी. विशेषज्ञों का कहना है कि AI आधारित सेवाओं, चैटबॉट्स, मशीन लर्निंग और बड़े डेटा प्रोसेसिंग सिस्टम की वजह से सर्वरों पर काम का बोझ लगातार बढ़ रहा है, जिसके कारण बिजली की जरूरत भी तेजी से बढ़ रही है.
AI सर्वर बन रहे हैं सबसे बड़े बिजली उपभोक्ता
रिपोर्ट के अनुसार, इस बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह AI-ऑप्टिमाइज्ड सर्वर हैं. ये सर्वर सामान्य सर्वरों की तुलना में ज्यादा कंप्यूटिंग क्षमता रखते हैं और अधिक बिजली की खपत करते हैं. अनुमान है कि 2026 में डेटा सेंटर्स की कुल बिजली खपत में AI सर्वरों की हिस्सेदारी 31 फीसदी होगी. इतना ही नहीं, 2027 तक AI सर्वर पारंपरिक सर्वरों से भी ज्यादा बिजली खर्च करने लगेंगे. AI तकनीक जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से उसके लिए मजबूत और ऊर्जा-समृद्ध इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत भी बढ़ रही है.
बिजली बन रही नई चुनौती
गार्टनर की डायरेक्टर एनालिस्ट लिंगलान वांग के अनुसार, अब AI की क्षमता केवल तकनीक पर नहीं बल्कि बिजली की उपलब्धता पर भी निर्भर करेगी. दुनिया भर में कंपनियां AI की दौड़ में आगे निकलने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन इसके लिए लगातार और सुरक्षित बिजली आपूर्ति जरूरी होगी. आने वाले समय में बिजली की उपलब्धता डेटा सेंटर्स के लिए सबसे अहम मुद्दों में से एक बन सकती है. अगर बिजली की सप्लाई पर्याप्त नहीं रही, तो AI सेवाओं और डिजिटल कारोबार पर सीधा असर पड़ सकता है.
2030 तक दोगुनी हो सकती है बिजली की जरूरत
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2030 तक डेटा सेंटर्स की बिजली खपत 1,200 टेरावाट घंटे से ज्यादा हो सकती है. यह मौजूदा स्तर की तुलना में काफी बड़ी वृद्धि होगी. विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में बनने वाले डेटा सेंटर्स की जरूरतों को पूरा करने के लिए मौजूदा पावर ग्रिड पर भारी दबाव पड़ेगा. इसलिए कंपनियों को अभी से बेहतर योजना बनानी होगी. हाई-एफिशिएंसी कूलिंग सिस्टम, एज कंप्यूटिंग और ऊर्जा बचाने वाली तकनीकों में निवेश बढ़ाना जरूरी होगा ताकि बिजली की बढ़ती मांग को संभाला जा सके.
डेटा सेंटर्स की बढ़ती बिजली खपत का असर केवल बिजली बिल तक सीमित नहीं रहेगा. हाल ही की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल दुनिया के डेटा सेंटर्स ने सऊदी अरब जितनी बिजली खर्च की थी. अगर 2030 तक बिजली की खपत दोगुनी हो जाती है, तो इससे कार्बन उत्सर्जन भी काफी बढ़ सकता है. अनुमान है कि इस अतिरिक्त कार्बन प्रभाव की भरपाई के लिए अगले दस वर्षों में करीब 6.7 अरब पेड़ लगाने की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे में AI के विस्तार के साथ पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा का महत्व भी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया है.
(इनपुट: IANS)
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