National Tourism Day 2024: 2 डरावनी जगहें जहां होती हैं पैरानॉर्मल एक्टिविटी फिर भी जाते हैं टूरिस्ट

National Tourism Day 2024: तेलंगाना में स्थित गोलकुंडा किले को देखने के लिए दूर-दूर से सैलानी आते हैं. यह कई सौ साल पुराना किला है. अब खंडहर हो चुका है लेकिन इसकी खूबसूरती टूरिस्टों को अभी भी मंत्रमुग्ध कर देती है.

Published date india.com Updated: January 25, 2024 9:40 AM IST
National Tourism Day 2024: 2 डरावनी जगहें जहां होती हैं पैरानॉर्मल एक्टिविटी फिर भी जाते हैं टूरिस्ट

National Tourism Day 2024: पर्यटन दिवस के मौके पर हम आपको भारत की ऐसी दो जगहों के बारे में बता रहे हैं, जहां पैरानॉर्मल एक्टिविटी होती है और उसके बाद भी टूरिस्ट इन जगहों पर जाते हैं और घूमते हैं. पर्यटक जिस तरह से नदी, पहाड़, झरने और वादियां देखते हैं, उसी तरह से उन्हें ऐसे किले और खंडहरों को घूमने का भी शौक होता है जो रहस्यमय होते हैं और जिनसे डरवानी घटनाएं जुड़ी होती हैं. ये ऐसी जगहें हैं, जिनके पीछे एक समृद्ध इतिहास छिपा हुआ है. आइए इन दो रहस्यमय जगहों के बारे में जानते हैं.

भानगढ़ किला राजस्थान

भानगढ़ का किला सुबह 6 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक खुलता है. इसके बाद इस किले में प्रवेश प्रतिबंधित है. अगर आप इस किले को देखने के लिए जा रहे हैं तो तय वक्त के बीच ही जाएं. यह किला दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर की दूरी पर है. यहां आप सड़क मार्ग से बेहद आसानी से जा सकते हैं. इस किले के बारे में लोगों का मानना है कि यह भूतिया किला है. यही वजह है कि जनमानस में भी इसे लेकर कई किस्से और कहानियां प्रचलित हैं. इस किले को पैरानॉर्मल एक्टिविटी का केंद्र माना जाता है.आर्केलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने भी यहां रात में जाने पर प्रतिबंध लगा रखा है.

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गोलकुंडा किला

तेलंगाना में स्थित गोलकुंडा किले को देखने के लिए दूर-दूर से सैलानी आते हैं. यह कई सौ साल पुराना किला है. अब खंडहर हो चुका है लेकिन इसकी खूबसूरती टूरिस्टों को अभी भी मंत्रमुग्ध कर देती है. इस किले का निर्माण 14वीं शताब्दी में हुआ था. सैलानियों के बीच यह किला काफी लोकप्रिय है.यह किला समुद्र तल से 480 फीट की ऊंचाई पर बना है. अब किला अपने पुरातन स्वरूप में मौजूद नहीं है और यहां खंडहर हैं, लेकिन फिर भी सैलानी इसे देखने के लिए जाते हैं. यह किला मराठा साम्राज्य के वक्त में बना. बताया जाता है कि इस किले का निर्माण सबसे पहले महाराजा वारंगल ने 14वीं शताब्दी में करवाया था. बाद में रानी रुद्रमा देवी और उनके पिताजी प्रतापरुद्र ने किले को सुदृढ़ीकरण करके इसका पुनर्निर्माण करवाया. यह किला भी अपने आप में रहस्य को समेटे हुए है.

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