Orchha and Sanchi Madhya Pradesh: मध्य प्रदेश में टूरिस्ट ओरछा और सांची की सैर कर सकते हैं. ये दोनों ही जगहें मध्य प्रदेश की फेमस जगहें. दूर-दूर से टूरिस्ट ओरछा और सांची घूमने के लिए आते हैं. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से सांची की दूरी सिर्फ 46 किलोमीटर है. सांची का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व है. यह जगह गौतम बुद्ध से संबंधित है. सांची भारत में सबसे अधिक विकसित और आकर्षक बौद्ध स्थल हैं. आइए इन दोनों ही जगहों के बारे में विस्तार से जानते हैं.
ओरछा मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड सम्भाग में बेतवा नदी के किनारे स्थित है. मध्य काल में यहां परिहार राजाओं की राजधानी थी. मुगल बादशाह अकबर में यहां के राजा मधुकर शाह थे, जिन्होंने मुगलों के साथ कई युद्ध किए थे. औरंगजेब के राज्य काल में छत्रसाल की शक्ति बुन्देलखण्ड में बड़ी हुई थी. ओरछा के राजाओं ने कई हिन्दी कवियों को आश्रय प्रदान किया था. आज भी यहां पुरानी इमारतों के खंडहर बिखरे पड़े हैं. ओरछा की स्थापना संबंधी जनश्रुतियां भी काफी रोचक हैं. एक जनश्रुति के अनुसार महाराज रुद्रप्रताप ओरछा के समीपस्थ राज कुंडार से आखेट की तलाश में घूमते हुए महर्षि तुंग के आश्रम तुङ्गारण्य तक आ गए. तभी उन्हें प्यास लगी और वे मछली भवन दरवाजे से बावली में उतरे, किन्तु जल अत्यधिक गंदा था. उनके साथियों ने महाराज को बताया कि थोड़ी दूर पर पावन सलिला बेतवा (बेत्रवती नदी) बहती है वहीं चलकर जल पिया जाए.
महाराज नदी पर गए, अंजलि में लेकर जल पिया. प्यास से तृप्ति पाकर लौटते समय महर्षि तुंग के दर्शन किए. ऋषि ने महाराज से याचना की कि सावन तीज को बावली के समीप मेला लगता है. वहां पर चोर भोले-भाले दुकानदारों को परेशान किया करते हैं, यदि आप रक्षा करें तो अति कृपा होगी.महाराज ने विचार किया कि यहां बावली के समीप तो गोंड राज्य की सीमा लगी हुई है इसलिए बिना नगर बसाए रक्षा करना संभव न हो सकेगा. इस पर ऋषि ने अनुरोध किया कि कुछ भी हो आपको यह पावन कार्य करना ही होगा. महाराज ने उन्हें रक्षा करने का वचन दे दिया और अपने साथियों को आदेश दिया कि इस स्थान पर विराट दुर्ग की नींव डाली जाए. नगर का नाम क्या रखना चाहिये यह तय नहीं हो पा रहा था. सभी पुन: ऋषि के समीप पहुंचे और इस विषय में उनकी राय जाननी चाही. उस समय वे स्नानादि से निवृत्त होकर लौट रहे थे। संयोग से जिस समय महाराज ने प्रश्न किया कि नगर का नाम क्या होना चाहिए उसी समय ऋषि को ठोकर लगी और उनके मुंह से निकला ‘ओच्छा’. यह सुनकर महाराज यहां से लौट आए और ‘ओच्छा’ नाम से नगर बसाना प्रारंभ कर दिया. यही ‘ओच्छा’ शब्द आगे चलकर परिमार्जित हुआ और ‘ओरछा’ में परिवर्तित हो गया.
सांची ने बौद्ध धर्म को अपनाया जिसने हिंदू धर्म की जगह ले ली. लेकिन समय ने इसकी मार झेली और धीरे-धीरे दोनों स्तूप और जगह भूल गए. 1818 में सांची को फिर से खोजा गया और यह पाया गया कि संरचना के अद्भुत टुकड़े अच्छे आकार में नहीं थे. धीरे-धीरे ऐतिहासिक और स्थान का धार्मिक महत्व पहचान लिया गया. स्तूपों का जीर्णोद्धार कार्य 1881 में शुरू हुआ और आखिरकार 1912 और 1919 के बीच इनकी सावधानीपूर्वक मरम्मत की गई और इन्हें बहाल किया गया. यह स्वीकार किया गया कि सांची में संरचना सबसे संगठित निर्माण है, जो मध्यकाल में मंदिरों की इंजीनियरिंग में चली गई थी.यहां की नक्काशी सटीकता के साथ की गई है. क्षति और पुनर्स्थापन कार्य के बावजूद सांची भारत में सबसे अधिक विकसित और आकर्षक बौद्ध स्थल है. सांची मुख्य रूप से स्तूपों और स्तंभों का एक स्थान है, लेकिन भव्य प्रवेश द्वार इस स्थान पर अनुग्रह करते हैं. ये द्वार खूबसूरती से उकेरे गए हैं और बुद्ध या अशोक के जीवन के दृश्यों को ले जाते हैं. ये प्रवेश द्वार प्रारंभिक शास्त्रीय कला के बेहतरीन नमूने हैं, जिन्होंने बाद की भारतीय कला की संपूर्ण शब्दावली का बीज बिस्तर बनाया. स्तंभों पर उकेरे गए चित्र और स्तूप घटनाओं की चलती कहानी को बुद्ध का जीवन बताते हैं. सांची के स्तूपों को भगवान बुद्ध की अस्थियों पर बनाया गया है.
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