लखनऊ: 25 की उम्र में सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) की परीक्षा पास की. ऑल इंडिया थर्ड रैंक मिली. यह बड़ी उपलब्धि थी. 10 दिन बाद ही जॉइनिंग थी, लेकिन तभी एक हादसे ने उनका चलना-फिरना छीन लिया. वह बिस्तर पर पहुंच गईं. डॉक्टर्स ने पूरी तरह आराम की सलाह दी. तीन साल में जब नूर ठीक हुई तो सीआईएसएफ़ ने उन्हें नौकरी ज्वाइन कराने से इंकार कर दिया. नूर ने कोर्ट का रुख किया. दिल्ली, हाईकोर्ट ने उन्हें सीआईएसएफ़ को आदेश दिए कि नूर को तुरंत ही ज्वाइन कराया जाए. कुछ लाइन में लिखी गई नूर की यह उपलब्धि से उनका संघर्ष कहीं ज्यादा बड़ा है. इस संघर्ष को सलाम करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने नूर फातिमा को समाज और देश की महिलाओं के लिए एक मिसाल बताया है. हाईकोर्ट के इन्हीं शब्दों के साथ यूपी के छोटे से शहर उरई के पास एक गांव की रहने वाली नूर फातिमा ने बड़ी लड़ाई जीत ली. परीक्षा पास करने के तीन साल बाद उन्हें सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ़) में जॉइनिंग मिल रही है. सीआईएसएफ में वह सब इंस्पेक्टर के तौर पर शामिल होंगीं. 28 साल की नूर कहती हैं कि यह सब उनके लिए सपने जैसा है.

पूरे देश में तीसरी रैंक मिली, जॉइनिंग से पहले पैर में चोट लगी
दरअसल, नूर फातिमा ने 2015 में सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स की परीक्षा पास की थी. उन्हें तब पूरे देश में तीसरी रैंक मिली थी. यह नूर के लिए बड़ी उपलब्धि थी, उन्हें 10 दिन ट्रेनिंग के लिए ज्वाइन करना था, लेकिन इससे पहले ही उन्हें एक हादसे के चलते पैर में गंभीर चोट लग गई. डॉक्टर ने उन्हें पूरी तरह से आराम की सलाह दी. वह बिस्तर पर आ गईं. इस बीच सीआईएसएफ ने उन्हें दो बार मौके देकर उनका इंतज़ार किया, लेकिन वह नहीं पहुंच सकीं. नूर बताती हैं कि उन्हें पूरे देश में अच्छी रैंक मिली थी. उन्हें ठीक होने में काफी समय लग गया. ठीक होकर जब वह सीआईएसएफ पहुंचीं तो उन्हें ज्वाइन कराने से इनकार कर दिया गया.

तीन साल बाद जॉइनिंग से इनकार करने पर दिल्ली हाईकोर्ट पहुंची
नूर कहती हैं कि पहले वह खुद से खड़े होने के लिए लड़ीं, इसके बाद उन्हें अपनी नौकरी के लिए लड़ना पड़ा. दिल्ली, हाईकोर्ट की ओर उन्होंने रुख किया. दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला उनके हक में सुनाया. और सीआईएसएफ को आदेश दिया कि वह तुरंत ही नूर को ज्वाइन कराए. इसके साथ ही हाई कोर्ट ने कहा कि नूर फातिमा जैसी लड़की इस देश की तमाम महिलाओं के लिए मिसाल है.

वर्दी पहनने के जुनून ने नहीं हारने दी हिम्मत
उरई के छोटे से गांव अटरिया की रहने वाली नूर फातिमा कहती हैं कि परिवार उनके साथ था लेकिन समय ज्यादा होने के साथ ही परिवार उन्हें जिद छोड़ने को कह रहा था. 28 साल उम्र होने पर शादी का दबाव भी था, लेकिन उनके सिर वर्दी पहनने का जुनून सवार था. परीक्षा पास करना और फिर हादसे के कारण ज्वाइन नहीं कर पाने फिर तीन साल बाद दिल्ली, हाईकोर्ट से नौकरी पा लेना इसी जुनून का हिस्सा है. उरई के नवोदय स्कूल से पढ़ने वाली नूर बताती हैं कि उन्होंने बचपन में ही तय कर लिया था कि वह बड़े होकर वर्दी वाली नौकरी ही करेंगीं. वह बताती हैं कि घर वाले पुलिस या आर्म फोर्स में भेजने को राजी नहीं थे. उनके मन में कई तरह से डर थे. इसके बाद भी उन्होंने फॉर्म भरा था. और परीक्षा भी पास की थी.

अब नूर पर परिवार को गर्व है
नूर के पिता कहते हैं कि उन्हें अपनी बेटी पर गर्व है. नूर के भाई उमर खान बताते हैं कि सभी खुश हैं. पहले बहन के भविष्य को लेकर चिंतित थे. अनिश्चितता थी. बहन की जिद को लेकर परिवार के लोग कई बार सहमत नहीं होते थे, लेकिन आखिरकार नूर ने मंजिल हासिल कर ली.