Opinion: PDA की राजनीति पर क्यों उठ रहे हैं सवाल? अखिलेश यादव के सामने खड़ी हुई नई चुनौती
अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले पर क्यों चर्चा हो रही है? इस खबर में पढ़ें समाजवादी पार्टी से जुड़े हालिया विवाद, विपक्ष के आरोप और राजनीतिक विश्लेषण के बारे में...
जनता केवल चुनावी नारों पर नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाले व्यवहार पर भरोसा करती है.
डॉ. अभय पाण्डेय | समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से PDA (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा आधार बता रहे हैं. उनका दावा है कि यह सामाजिक न्याय का नया मॉडल है और इसके जरिए पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को बराबरी की राजनीतिक भागीदारी दिलाई जाएगी. अखिलेश यादव भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) पर आरोप लगाते हैं कि उसके शासन में सबसे ज्यादा अत्याचार इसी वर्ग पर हो रहे हैं. लेकिन दूसरी ओर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से सामने आई कई घटनाओं ने इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं. आरोप है कि कई मामलों में सपा से जुड़े नेताओं या समर्थकों के नाम सामने आए, जिससे विपक्ष को PDA के नारे पर सवाल उठाने का मौका मिल गया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी नारे की विश्वसनीयता तभी बनती है, जब उसका असर पार्टी के संगठन और नेताओं के व्यवहार में भी दिखाई दे.
प्रयागराज से लेकर मेरठ तक सपा की चर्चा
हाल ही का सबसे चर्चित मामला प्रयागराज का है, जहां सपा के विधायक हाकिम लाल के खिलाफ दो भाइयों की मौत के मामले में FIR दर्ज हुई. मृतकों के परिजनों का आरोप है कि करीब दो करोड़ रुपये की पुश्तैनी जमीन के विवाद को लेकर उन्हें लगातार धमकियां मिल रही थीं और बाद में दोनों भाइयों की हत्या कर शव फंदे से लटका दिए गए. इससे पहले प्रयागराज के मेजा क्षेत्र में गुप्ता परिवार के तीन लोगों की हत्या का मामला भी सुर्खियों में रहा, जिसमें आरोप एक यादव युवक पर लगा. इसके अलावा प्रदेश के कई जिलों में दलितों और गैर-यादव पिछड़ों के साथ मारपीट, हत्या और उत्पीड़न के मामलों में यादव या मुस्लिम समुदाय के लोगों के नाम सामने आने की चर्चा रही. विपक्ष का आरोप है कि ऐसे मामलों में समाजवादी पार्टी की ओर से अपेक्षित सख्त प्रतिक्रिया नहीं दिखी.
SP के अंदर भी चल रही टूट?
बता दें समाजवादी पार्टी के अंदर भी कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने PDA की राजनीति पर बहस तेज कर दी. प्रयागराज में अखिलेश यादव की मौजूदगी में विधायक संदीप पटेल का विरोध हुआ. बांदा से सांसद कृष्णादेवी शिवशंकर पटेल के साथ कथित अभद्रता का मामला भी चर्चा में रहा. मुरादाबाद में कमाल अख्तर और रुचि वीरा के बीच विवाद खुलकर सामने आया. अमेठी में विधायक महाराजी देवी के साथ अभद्रता के आरोप लगे, जबकि चंदौली में महिला नेता गार्गी पटेल के साथ मारपीट की घटना भी सुर्खियों में रही. मेरठ में एक कार्यक्रम के दौरान दलित नेता के सार्वजनिक अपमान का वीडियो भी वायरल हुआ. इन घटनाओं ने पार्टी के अंदर गुटबाजी और सामाजिक संतुलन को लेकर कई सवाल खड़े किए.
क्या PDA सिर्फ नारा बनकर रह जाएगा?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जनता केवल चुनावी नारों पर नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाले व्यवहार पर भरोसा करती है. विपक्ष लगातार इन घटनाओं, पुलिस रिकॉर्ड और पार्टी की प्रतिक्रिया को आधार बनाकर PDA की राजनीति पर सवाल उठा रहा है. इसी क्रम में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी तंज कसते हुए PDA का अलग अर्थ बताते हुए समाजवादी पार्टी पर निशाना साधा. दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि जब दलितों, गैर-यादव पिछड़ों या महिलाओं से जुड़े विवादों में पार्टी के नेताओं के नाम सामने आते हैं, तब अखिलेश यादव की चुप्पी भी बहस का विषय बन जाती है. अगर समाजवादी पार्टी वास्तव में PDA को अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनाना चाहती है, तो उसे केवल मंचों से नारे देने के बजाय संगठन और कार्यकर्ताओं के स्तर पर भी समान सम्मान, जवाबदेही और सामाजिक न्याय का संदेश व्यवहार में दिखाना होगा. तभी यह दावा राजनीतिक नारे से आगे बढ़कर लोगों के बीच भरोसे का आधार बन सकेगा.
(डॉ. अभय पाण्डेय दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. वह समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं)
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