प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लखनऊ के जिला मजिस्ट्रेट और आयुक्त को पिछले वर्ष दिसंबर में संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के विरोध के दौरान निजी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपियों के पोस्टर वहां की सड़कों से हटाने का सोमवार को निर्देश दिया. मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की खंडपीठ ने लखनऊ के डीएम और आयुक्त को 16 मार्च तक इसकी रिपोर्ट सौंपने को कहा. Also Read - कोरोना वायरस के चलते दो सप्ताह तक नहीं होगी किसी प्रकार की वसूली: इलाहाबाद हाइकोर्ट

  Also Read - उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने के बारे में अभी तय नहीं किया : उप्र सरकार

सीएए का कथित तौर पर विरोध करने और निजी एवं सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपियों के पोस्टर चिपकाने की राज्य सरकार की कार्रवाई से जुड़े इस मामले में पीठ ने रविवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. अपर महाधिवक्ता नीरज त्रिपाठी ने बताया कि अदालत ने कहा है कि सरकार की यह कार्रवाई (पोस्टर लगाने की) अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है इसलिए पीठ ने लखनऊ के जिलाधिकारी और मंडलायुक्त को होर्डिंग हटाने का निर्देश दिया है. त्रिपाठी ने बताया कि पीठ ने 16 मार्च को या इससे पहले इस संबंध में रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है. रिपोर्ट सौंपे जाने पर यह मामला निस्तारित हुआ मान लिया जाएगा. राज्य सरकार की ओर से पेश हुए महाधिवक्ता राघवेंद्र प्रताप सिंह ने दलील दी थी कि अदालत को इस तरह के मामले में जनहित याचिका की तरह हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.

हाईकोर्ट ने लिया था मामले का स्वतः संज्ञान
उन्होंने कहा था कि अदालत को ऐसे कृत्यों का स्वतः संज्ञान नहीं लेना चाहिए जो ऐसे लोगों द्वारा किए गए हैं जिन्होंने सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है. महाधिवक्ता ने सीएए प्रदर्शनकारियों के पोस्टर लगवाने की राज्य सरकार की कार्रवाई को ‘डराकर रोकने वाला कदम’ बताया था ताकि इस तरह के कृत्य भविष्य में दोहराए न जाएं. इससे पहले अदालत ने सात मार्च को पिछले साल दिसंबर में सीएए के विरोध के दौरान हिंसा के आरोपियों के पोस्टर लगाए जाने का स्वतः संज्ञान लिया था. सात मार्च के ही आदेश में अदालत ने लखनऊ के डीएम और मंडलीय आयुक्त को उस कानून के बारे में बताने को कहा था जिसके तहत लखनऊ की सड़कों पर इस तरह के पोस्टर एवं होर्डिंग लगाए गए.

पुलिस ने लखनऊ में कई जगह लगाए थे पोस्टर
उल्लेखनीय है कि पुलिस ने पिछले साल दिसंबर में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के दौरान हिंसा में लिप्त आरोपियों की पहचान कर पूरे लखनऊ में उनके कई पोस्टर और होर्डिंग्स लगाए हैं. इन होर्डिंग्स में आरोपियों के नाम, फोटो और आवासीय पतों का उल्लेख है जिसके चलते नामजद लोग अपनी सुरक्षा को लेकर आशंकित हैं. इन आरोपियों को एक निर्धारित समय सीमा के भीतर सार्वजनिक और निजी संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई करने को कहा गया है और भुगतान नहीं करने पर जिला प्रशासन द्वारा उनकी संपत्तियां जब्त करने की बात कही गई है.