लखनऊ: आज जब राष्ट्र के शलाका पुरूष अटल बिहारी वाजपेयी चिरनिद्रा में सो गये हैं तो उनके बारे में इस समय कुछ कहने में गला भर जा रहा है.’’ यह कहना है अटल की कर्मभूमि रहे उनके निर्वाचन क्षेत्र लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार एवं अटल को अत्यंत करीब से देखने समझने वाले प्रद्युम्न तिवारी का. Also Read - Black Death: कोरोना के बाद चीन से निकली यह नई महामारी, यूरोप में मरे थे 5 करोड़ लोग, पढ़िए ये रिपोर्ट

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उन्होंने बताया, ‘जब से होश संभाला, तब से अटल आंखों में बसे हैं. कारण, मेरे पिता और राष्ट्रधर्म पत्रिका के संस्थापकों में से एक बजरंग शरण तिवारी (अब दिवंगत) शुरूआत से ही अटल जी से जुड़े रहे. ये अंतरंग रिश्ते ही थे कि अटल आजादी के कुछ पहले हमारे लखनऊ स्थित आवास पर कुछ दिन ठहरे थे.

देश सेवा के लिए राजनीति में आए अटल

प्रद्युम्न तिवारी ने बताया कि अटल को शुरूआत से ही कुछ इस सहज रूप में पाया जैसे वह आम व्यक्ति हों और उनसे बात में कोई हिचक ना महसूस हुई. जब कुछ राजनीतिक समझ आई तो अटल के लखनऊ आने पर एक दिन सहज रूप से उनसे पूछ बैठा कि आप राजनीति में क्यों आए जबकि आपकी लेखनी प्रबल है. इस पर अटल बोले, ‘राजनीति में आने का मकसद कोई धन कमाना नहीं होता, राजनीति देश सेवा के लिए है और इसे बखूबी निभा भी रहा हूं.’

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पूछो क्या पूछते हो….

अटल के साथ बिताये समय को याद करते हुए तिवारी ने बताया कि 1984 में पत्रकारिता के क्षेत्र में नया-नया था. अटल जी लखनऊ आए और मीराबाई मार्ग स्थित राज्य अतिथि गृह के कमरा संख्या—एक में ठहरे हुए थे. ‘मैं जिस अखबार में था, उसके लिए उनका साक्षात्कार लेने पहुंच गया. नया था इसलिए मन में घबराहट भी थी कि इतने बडे़ नेता का साक्षात्कार कैसे करूंगा. पर अटल जी से मिलने और परिचय देने के बाद जब साक्षात्कार की बात कही तो वह मुस्कुराए और कंधे पर हाथ रखकर कहा … पूछो क्या पूछते हो.’

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उन्होंने बताया कि उस दौर में अटल जी के उदारवादी और लालकृष्ण आडवाणी के कट्टरवादी रूख के चलते दोनों में मतभेद की अटकलें थीं. ‘मैंने पहला ही सवाल किया कि आप में और आडवाणी में मतभेद हैं फिर पार्टी किस तरह से पटरी पर सुचारू रूप से चलेगी … इस पर अटल ने मुस्कुरा कर अपनी चिर परिचित शैली में उत्तर दिया कि कोई मतभेद नहीं है. हम लोगों में विचार विनिमय होता है. इसको मतभेद का नाम देना उचित नहीं है.’