लखनऊ. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का यूपी की राजधानी से खास लगाव रहा है. वह यहां से चुनाव लड़ा करते थे. अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार 1991 में लखनऊ से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे. हालांकि वे 1957 में ही बलरामपुर से निर्वाचित होकर लोकसभा के सदस्य बन चुके थे. Also Read - कमर में छिपाए हुए थे 28 करोड़ रुपए का 55.61 किलो विदेशी सोना, दिल्‍ली, लखनऊ में किया जब्‍त

Also Read - टीके को लेकर लोगों में संदेह! एम्स निदेशक बोले- डरें मत, वैक्सीन आपको मारेगी नहीं

लखनऊ से चुनाव जीतने का महत्व इसलिए है क्योंकि वे 1954 में लोकसभा के लिए एक उपचुनाव में जनसंघ उम्मीदवार के रूप में पहली बार लखनऊ से ही चुनाव मैदान में उतरे थे. इसके बाद वे प्राय: सभी लोकसभा चुनाव में (1980 को छोड़कर जब भाजपा ने यह सीट जनता पार्टी के लिए समझौते में छोड़ दी थी) वे अन्य स्थानों के अलावा लखनऊ से भी उम्मीद्वार हुआ करते थे. अटल बिहारी वाजपेयी को लखनऊवासी सिर्फ अटलजी कहकर संबोधित करते हैं. Also Read - Coronavirus Vaccination: कौन हैं मनीष कुमार जिन्हें सबसे पहले लगा कोरोना का टीका, बोले- वैक्सीन लगते ही...

अटल विहारी वाजपेयी का 50 साल का राजनैतिक जीवन, फर्श से अर्श तक का यूं तय किया सफर

लखनऊ में 1947 में आए

अटल बिहारी बाजपेयी 1947 में ग्वालियर से लखनऊ आए. यहां पर पीएचडी करने आए अटल की पीएचडी तो पूरी नहीं हुई लेकिन वह सफल पत्रकार और राजनेता बन गए. उन्हें लखनऊ से प्रकाशित राष्ट्रधर्म पत्रिका के संपादन की जिम्मेदारी मिली. हालांकि उस समय लखनऊ में उनका कोई ठिकाना नहीं था इसलिए अटल कुछ समय अपने सहयोगी बजरंग शरण तिवारी के घर पर रहे. कुछ वक्त वह एसपी सेन रोड स्थित किसान संघ भवन में भी रुके. फिर अपने मित्र कृष्ण गोपाल कलंत्री के घर पर गन्ने वाली गली में रहे. सांसद बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी काफी समय मीराबाई मार्ग के विधायक गेस्ट हाउस में रहे. इसके बाद उन्हें ला प्लास कॉलोनी में आवास दिया गया.

नेहरू ने कहा था- बहुत आगे जाओगे, अटल ने उन्हीं का रिकॉर्ड तोड़ साबित किया

मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म को ऊंचाईयों पर पहुंचाया

बताते हैं कि आजादी से पहले भाऊराव देवरस और पं. दीन दयाल उपाध्याय ने लखनऊ से मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म प्रकाशित करने की योजना बनाई तो संपादक की तलाश शुरू हुई. ऐसे में अटल का नाम सामने आया. भाऊराव के कहने पर अटल पीएचडी छोड़कर मासिक पत्र का संपादन करने लगे और 31 दिसंबर 1947 को राष्ट्रधर्म का पहला अंक आया. उस वक्त शायद ही किसी पत्र की 500 कॉपियां छपती हो, लेकिन राष्ट्रधर्म के पहले अंक की ही तीन हजार प्रतियां बाजार में आईं और हाथों-हाथ बिकीं. यह अटल के संपादन का ही चमत्कार था कि दूसरा अंक छपते-छपते प्रसार संख्या आठ हजार और तीसरे अंक तक 12 हजार पहुंच गई.