नई दिल्ली. शहनाई को संगीत में बुलंदी की मुकाम तक पहुंचाने वाले उस्ताद बिस्मिल्ला खान की आज 102वीं जयंती है. सुबह-सुबह ही गूगल ने उनका डूडल बना दिया. शहनाई के सुर कानों में तैर गए. मूलतः बिहार के डुमरांव के रहने वाले उस्ताद जीवनभर बनारस यानी काशी में ही रहे. बिहार के वरिष्ठ पत्रकार निराला उस्ताद को श्रद्धांजलि देते हुए सोशल मीडिया पर लिखते हैं, ‘बिहार से जन्मना रिश्ते पर बात शुरू करते ही उस्ताद ने रोक दिया… अरे यार मैं बनारसी हूं.’ बनारस से ऐसा प्यार था उस्ताद को. Also Read - Ustad Bismillah Khan's Padma Vibhushan Certificate Partially Eaten up by Termites | दिवंगत शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान के पद्म विभूषण प्रमाणपत्र में लगी दीमक

6 साल की उम्र में ही आ गए थे बनारस
बिस्मिल्लाह खान का जन्म 21 मार्च 1916 को डुमरांव में हुआ था. पिता भोजपुर रियासत के दरबारी संगीतकार थे. छह साल की उम्र में ही नन्हे बिस्मिल्ला खान वाराणसी आ गए. यहीं पर उन्होंने शहनाई बजाना सीखा. यह वाद्य यंत्र उस समय शादी-विवाह के मौकों पर बजाया जाने वाला वाद्य यंत्र ही था. लेकिन उस्ताद के अपनाते ही आज यह संगीत के सबसे प्रसिद्ध वाद्य यंत्रों में से एक है. न सिर्फ शादी समारोहों, आज बल्कि शहनाई के सोलो-प्रोग्राम आयोजित किए जाते हैं. उस्ताद बिस्मिल्ला खान के संगीत के प्रति समर्पण को भारत सरकार ने भी सराहा और 2001 में भारत रत्न से सम्मानित किया. एम.एस. सुब्बोलक्ष्मी और रवि शंकर के बाद यह सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वाले वे तीसरे शास्त्रीय संगीतकार थे.

बनारस में उपेक्षा के शिकार हैं उस्ताद के परिजन
समाचार एजेंसी भाषा के अनुसार देश और दुनिया भर में शहनाई को मकबूलियत दिलाने वाले उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां का पद्मभूषण अवार्ड और उनसे जुड़े अन्य सामान यहां हड़हा सराय स्थित उनके घर में उपेक्षित पड़े हैं. बिस्मिल्ला ख़ां के पोते नासिर ने बताया कि दादा को मिले पद्मभूषण अवार्ड की आज कोई कीमत नहीं है। देख-रेख के अभाव में उसका कुछ हिस्सा दीमक खा रही है. इसके अलावा उनके कमरे में आज भी उनका छाता, कुर्सी, टेलीफ़ोन, जूता, बर्तन और चारपाई है लेकिन वह सब भी उपेक्षा का शिकार है.

आर्थिक विपन्नता घर कर रही है
नासिर का कहना है कि परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि सबका पेट भरना तक मुश्किल हो रहा है. ऐसे में उनके सामान को सहेजकर रखना परिवार के लिए मुश्किल हो रहा है. उन्होंने बताया कि उनके दादा के गुजर जाने के बाद वहां एक संगीत अकादमी खोले जाने की बात हुई थी. इसमें दादा से जुड़ी यादों को सहेजने की बात थी लेकिन वह सिर्फ वादा ही रह गया है.

(इनपुट भाषा से भी)