लखनऊ: यूपी विधानसभा में भाजपा विधायक देवमनी द्विवेदी ने सुल्‍तानपुर जिले का नाम बदलकर कुशभवानपुर रखने का प्रस्‍ताव रखा है. उन्‍होंने बताया कि इस प्रस्‍ताव पर चर्चा करने के लिए सदन की सहमति भी मिल गई है.

कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले का प्राचीन नाम कुशभवनपुर था. पौराणिक मान्यतानुसार आज का सुल्तानपुर जिला पूर्व में गोमती नदी के तट पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के पुत्र कुश द्वारा बसाया गया कुशभवनपुर नाम का नगर था. खिलजी वंश के सुल्तान ने भरों को पराजित करके इस नगर को सुल्तानपुर नाम से बसाया. इसके अलावा मान्‍यता है कि वनवास के समय सीता जी यहीं ठहरी थीं. उनकी याद में यहां आज भी सीताकुंड घाट है. तब इस स्थान को कुशभवनपुर के नाम से ही जाना जाता था. सुलतानपुर के गजेटियर में भी कुशभवनपुर का उल्लेख मिलता है.

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सीएम योगी ने पहले भी बदलें हैं कई नाम
बता दें कि यूपी का मुख्यमंत्री बनते ही योगी आदित्यनाथ ने ताबड़तोड़ कई पुराने नामों को बदलकर नए नाम रख दिए. मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय रख दिया गया है. इसके अलावा बरेली एयरपोर्ट का नाम नाथ एयरपोर्ट, गोरखपुर सिविल एयरपोर्ट को योगी गोरखनाथ एयरपोर्ट, आगरा एयरपोर्ट को दीनदयाल उपाध्याय एयरपोर्ट और कानपुर के चकेरी एयरपोर्ट को पत्रकार व स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम बदलने का प्रस्‍ताव दिया है.

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यह है सुल्‍तानपुर जिले का इतिहास
सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश राज्य का एक ऐसा भाग है जहां अंग्रेजी शासन से पहले उदार नवाबों का राज था. पौराणिक मान्यतानुसार आज का सुल्तानपुर जिला पूर्व में गोमती नदी के तट पर मर्यादा पुरुषोत्तम “भगवान श्री राम” के पुत्र कुश द्वारा बसाया गया कुशभवनपुर नाम का नगर था. खिलजी वंश के सुल्तान ने राजभरों के राजा नंदकुवर राय को पराजित कर के इस नगर को सुल्तानपुर नाम से बसाया. यहां की भौगोलिक उपयुक्तता और स्थिति को देखते हुए अवध के नवाब सफदरजंग ने इसे अवध की राजधानी बनाने का प्रयास किया था, जिसमें उन्हें सफलता नहीं मिली. स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सुल्तानपुर का अहम स्थान रहा है. 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 09 जून 1857 को सुल्तानपुर के तत्कालीन डिप्टी-कमिश्नर की हत्या कर इसे स्वतंत्र करा लिया गया था. संग्राम को दबाने के लिए जब अंग्रेजी सेना ने कदम बढ़ाया तो चांदा के कोइरीपुर में अंग्रेजों से जमकर युद्ध हुआ था. चांदा, गभड़िया नाले के पुल, अमहट और कादू नाले पर हुआ ऐतिहासिक युद्ध उत्तर प्रदेश की फ्रीडम स्ट्रगल इन उत्तर प्रदेश नामक किताब में दर्ज तो है लेकिन आज तक उन स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की याद में कुछ भी नहीं किया गया. न स्तंभ बने न शौर्य-लेख के शिलापट. यहां की रियासतों में मेहंदी हसन, राजा दियरा जैसी रियासतों का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज है.