नई दिल्ली: यूपी की फूलपुर लोकसभा सीट के चुनावी नतीजों से बीजेपी बुरी तरह आहत हुई. वहीं, इस चुनाव ने बाहुबली माने जाने वाले अतीक अहमद की राजनीतिक और ‘भाई’ वाली हनक को भी जमीन पर ला दिया है. अतीक के लिए यह हार इसलिए भी सदमा देने वाली है क्योंकि जीतने वाले सपा प्रत्याशी की तुलना में उन्हें काफी कम वोट मिले. यह तब हुआ जब मुस्लिम बाहुल्य फूलपुर में ‘पहले भाई, फिर सपाई’ का नारा दिया जा रहा था. अतीक को उम्मीद थी कि मुस्लिम वोट सपा के गैर मुस्लिम प्रत्याशी की बजाय अतीक अहमद को जाएगा, लेकिन खाते में आई शर्मनाक हार बता रही है कि मुस्लिमों ने अतीक के इस नारे को पूरी तरह से खारिज कर दिया. Also Read - किसानों को गुलाम बनाने वाले कानून से भाजपा के खिलाफ बना जन आंदोलन, ये भारी पड़ेगा : अखिलेश यादव

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कभी समाजवादी पार्टी का हिस्सा रहे अतीक अहमद इस बार निर्दलीय ही मैदान में उतरे. देवरिया जेल में बंद अतीक ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर यह चुनाव लड़ा था. उन्होंने जीत के लिए अपने समर्थकों के माध्यम से जिताने की अपील की थी. इसके बाद फूलपुर में मुस्लिमों के बीच ‘पहले भाई, फिर सपाई’ का नारा दिया जा रहा था. यह नारा चर्चा का विषय था. इस नारे के जरिए यह बताने की कोशिश की जा रही थी कि सपा प्रत्याशी नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल की बजाय मुस्लिम वोट अतीक को जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. अतीक अहमद को सिर्फ 48, 094 वोट मिले, जबकि जीतने वाले सपा उम्मीदवार नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल को 3,42,922 वोट मिले.

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इसलिए हारे चुनाव, लोग गिना रहे ये कारण

इलाहाबाद में वकालत करने वाले सरफराज अहमद कहते हैं कि अधिकतर मुस्लिम ये बात समझ रहे थे कि वह अगर अतीक को समर्थन करते हैं तो इसका फायदा भाजपा को मिलता. फिर बसपा भी सपा के साथ थी, इसलिए अतीक के जीतने की उम्मीद कम ही थी. वह कहते हैं कि अतीक बाहर होते तो हो सकता है कुछ और लोग उन्हें समर्थन करते. वहीं, इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में सक्रिय रहने वाले राम बाबू तिवारी कहते हैं कि अतीक शायद ही कोई चुनाव जीतें. वोटर जतना समझदार हो गई है.

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फूलपुर से सांसद रह चुके हैं अतीक, सपा ने किया था पार्टी से बाहर

अतीक़ अहमद फूलपुर से एक बार सांसद रह चुके हैं और इलाहाबाद की शहर पश्चिमी सीट से कई बार विधायक भी रहे हैं. माना जाता रहा है कि अतीक जितनी बार चुनाव जीते अपनी दबंग छवि के कारण जीते. एक आपराधिक मामले में वो इस समय भी देवरिया जेल में बंद हैं. उन्होंने जेल से ही उपचुनाव लड़ा था. पिता अतीक अहमद के समर्थन में चुनाव प्रचार करने वाले उमर अहमद ने उपचुनाव से पहले कहा था कि हम नहीं चाहते थे कि बीजेपी का उम्मीदवार आसानी से जीत जाए. उनका कहना था कि सपा के उम्मीदवार को कोई जानता तक नहीं है. इसलिए हमारे अब्बा ने यहां से चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया. बता दें कि समाजवादी पार्टी ने 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्हें शहर पश्चिमी सीट से टिकट न देकर कानपुर से लड़ा दिया था और 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए उन्हें श्रावस्ती भेज दिया था. अतीक़ ये दोनों चुनाव हार गए थे. इसके बाद सपा ने अतीक को बाहर का रास्ता दिखा दिया था.

जेल में बंद अतीक पर दर्ज हैं कई संगीन मामले

अतीक अहमद पर कई आपराधिक मुक़दमे दर्ज हैं, जिनमें कई संगीन अपराध भी शामिल हैं. 1992 में इलाहाबाद पुलिस ने अतीक अहमद के कथित अपराधों की सूची जारी की थी और तब बताया गया था कि उनके ख़िलाफ़ उत्तर प्रदेश के कई शहरों के अलावा बिहार में भी हत्या, अपहरण, जबरन वसूली आदि के मामले क़रीब चार दर्जन मामले दर्ज हैं. अतीक के खिलाफ सबसे ज्यादा मामले इलाहाबाद जिले में ही दर्ज हुए हैं.