UP में मुस्लिम CM बनाने की हो रही मांग, अखिलेश यादव को मिली चिट्ठी से मचा बवाल, लाइव डिबेट में भिड़ गए AIMJ और RSS नेता
Debate Story: उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा और 80 लोकसभा सीटों में से करीब 120 से 140 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में रहते हैं.
ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की मटेरा सीट से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली को AIMIM का उम्मीदवार बना दिया है. (ANI)
- जातीय समीकरणों से तय होती यूपी की राजनीति.
- यूपी में मुस्लिम आबादी करीब 19.3 प्रतिशत.
- पश्चिम यूपी में सबसे ज्यादा राजनीतिक असर.
- भाजपा विरोधी वोटों का होता ध्रुवीकरण.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मुस्लिम मुख्यमंत्री की मांग को लेकर सूबे की सियासत गरमा गई है. ऑल इंडिया मुस्लिम जमात ने पूर्व CM और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव से एक मुस्लिम मुख्यमंत्री चेहरे का ऐलान करने की मांग की है. वहीं, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है. इससे सपा, कांग्रेस और BJP के बीच त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है. इस पूरे मामले को लेकर लाइव टीवी डिबेट में AIMJ और राष्ट्रीय जागरण अभियान नेताओं के बीच हाईवोल्टेज ड्रामा देखने को मिला.
मौका था एक प्राइवेट न्यूज चैनल के शाम 6 बजे के डिबेट शो का. मंगलवार (23 जून 2026) को इस शो में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 और मुस्लिम CM चेहरे की मांग पर बहस हो रही थी. इस डिबेट में ऑल इंडिया मुस्लिम जमात (AIMJ) से मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी , AIMIM से शादाब चौहान, RSS के राष्ट्रीय जागरण अभियान से सुबुही खान और समाजवादी पार्टी से धर्मेंद्र यादव मौजूद थे.
मुस्लिम संगठनों का दबाव
दरअसल, ऑल इंडिया मुस्लिम जमात ने समाजवादी पार्टी (SP) प्रमुख अखिलेश यादव को चिट्ठी लिखकर मांग की है कि 2027 के चुनाव में किसी मुस्लिम चेहरे को CM पद का उम्मीदवार बनाया जाए. इस चिट्ठी में दलील दी गई है कि राज्य में यादव आबादी लगभग 7% है, जबकि मुस्लिम आबादी 22% है. इसलिए मुसलमानों को CM पद पर बड़ा हक मिलना चाहिए.
डिबेट में क्या हुआ?
अब लाइव TV डिबेट में ऑल इंडिया मुस्लिम जमात मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने दलील दी है, "एक सच्चा मुसलमान कभी किसी का हक नहीं मारता. आज जो देश और प्रदेश की स्थिति है, उसे देखते हुए मुस्लिम CM की मांग बिल्कुल जायज है." वहीं, राष्ट्रीय जागरण अभियान से सुबुही खान ने रिजवी की बात को बीच में काटते हुए कहा कि प्रदेश में CM योगी के राज में ऐसा क्या गलत हो रहा, जो मुस्लिम प्रतिनिधित्व की बात की जा रही है? क्या अब तक विधानसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा था? मुस्लिम या हिंदू CM की बात करके असल में देश और समाज को तोड़ने की बात की जा रही है. इन दोनों नेताओं के बीच मामला इतना बढ़ गया कि एंकर को बीच में डिबेट रोकनी पड़ गई.
AIMIM का बहराइच से आगाज
असदुद्दीन ओवैसी ने उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले की मटेरा सीट से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शौकत अली को AIMIM का उम्मीदवार घोषित कर 2027 के चुनाव का शंखनाद कर दिया है. ओवैसी की पार्टी मुख्य रूप से पश्चिमी यूपी (मुरादाबाद, बिजनौर) और पूर्वांचल (आजमगढ़, मऊ) के इलाकों में अखिलेश यादव के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी कर सकती है.
ओवैसी ने साफ संकेत दिया है कि अगर समाजवादी पार्टी उन्हें बराबरी की हिस्सेदारी दे, तो वे गठबंधन करने के लिए तैयार हैं, लेकिन अखिलेश ने सपा को इसका जिम्मेदार मानने से इनकार कर दिया है.
इमरान मसूद का रुख
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद भी अखिलेश यादव पर आक्रामक हैं और ओवैसी की तरह सीधे मुस्लिम मुद्दों पर मुखर होकर अखिलेश के 'PDA' फॉर्मूले के सामने चुनौती पेश कर रहे हैं.
UP में कितनी है मुस्लिम आबादी ?
उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और यहां मुस्लिम समुदाय का राजनीतिक प्रभाव काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. 2011 की जनगणना के अनुसार, राज्य की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी करीब 19.3% थी. जनसंख्या वृद्धि के मौजूदा अनुमानों के आधार पर माना जाता है कि यह आंकड़ा अब 20% के आसपास पहुंच चुका है. राज्य की 403 विधानसभा और 80 लोकसभा सीटों में से करीब 120 से 140 सीटें ऐसी मानी जाती हैं, जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में रहते हैं.
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कितना है वोट प्रतिशत?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रोहिलखंड, अवध और पूर्वांचल के कई जिलों में मुस्लिम आबादी 25% से 50% तक है. मतदान प्रतिशत के लिहाज से भी मुस्लिम समुदाय काफी सक्रिय माना जाता है. यही वजह है कि यूपी की लगभग हर बड़ी राजनीतिक पार्टी मुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करती है. राज्य की सत्ता के समीकरण में मुस्लिम वोट बैंक आज भी एक निर्णायक भूमिका निभाता है.
मुस्लिम वोट किस पार्टी के साथ जाता है?
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट लंबे समय से रणनीतिक मतदान के लिए जाना जाता है. पिछले तीन दशकों में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा उस पार्टी के साथ खड़ा होता रहा है, जिसे BJP को हराने की सबसे मजबूत स्थिति में माना जाता है. 1990 के दशक में यह समर्थन मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच बंटा हुआ था. हालांकि, पिछले कुछ चुनावों में मुस्लिम वोटों का बड़ा हिस्सा समाजवादी पार्टी की ओर शिफ्ट होता दिखाई दिया है.
2022 विधानसभा चुनाव और 2024 लोकसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा वर्ग सपा के साथ गया.कांग्रेस भी कुछ क्षेत्रों में मुस्लिम समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है. दूसरी ओर BJP को मुस्लिम वोट अपेक्षाकृत कम मिलता है. हालांकि, पार्टी लगातार मुस्लिम समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंच बनाने का प्रयास कर रही है.
क्या है PDA समीकरण?
PDA का मतलब है पिछड़ा (P), दलित (D) और अल्पसंख्यक (A). यह राजनीतिक फार्मूला समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेशन यादव ने हाल के समय में इसे प्रमुखता से सामने रखा. PDA का उद्देश्य राज्य के उन सामाजिक समूहों को एक राजनीतिक मंच पर लाना है, जिनकी आबादी मिलाकर उत्तर प्रदेश में बहुमत के करीब पहुंचती है. सपा का दावा है कि अगर पिछड़े वर्ग, दलित समुदाय और अल्पसंख्यक एकजुट होकर मतदान करें, तो वे चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकते हैं.
BJP के सामाजिक गठबंधन को चुनौती देने की कोशिश
PDA रणनीति को मंडल राजनीति के नए संस्करण के रूप में भी देखा जाता है. 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान सपा ने कई सीटों पर PDA फॉर्मूले के आधार पर उम्मीदवार उतारे और इसे अपनी मुख्य चुनावी रणनीति बनाया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह समीकरण सीधे तौर पर BJP के सामाजिक गठबंधन को चुनौती देने की कोशिश है.
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