इटावा: 'मुग़ल-ए-आज़म' बनाने वाले के. आसिफ के नाम से होगा 'चंबल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल', पोस्टर रिलीज

के. आसिफ यूपी के इटावा शहर में जन्मे थे. फिल्म फेस्टिवल उन्हीं को समर्पित होगा.

Published: October 28, 2018, 6:08 PM IST

इटावा (यूपी):  के. आसिफ चंबल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के दूसरे संस्करण का पोस्टर आज चंबल संग्रहालय में जारी किया गया. यह तीन दिवसीय आयोजन आगामी 24-26 नवंबर के बीच इटावा शहर में होगा, जिसमें तमाम सरोकारी शख्सियतें शिरकत करेंगी. पोस्टर रिलीज के बाद प्रसिद्ध दस्तावेजी फिल्म निर्माता शाह आलम ने कहा कि मशहूर बॉलीवुड फिल्म डायरेक्टर के. आसिफ ने महज 3 ही फिल्में निर्देशित कीं, लेकिन बड़ी ही शिद्दत और जुनून के साथ. इनमें से एक अधूरी रही, इसके बावजूद वे नजीर बन गए. फि‍ल्म ‘मुगल-ए-आजम’ भारतीय उप महाद्वीप की ऐसी एकमात्र क्लासिक हिट फि‍ल्म है, जि‍से भारतीय सिनेमा में एक ‘मील का पत्थर’ माना जाता है. इस फि‍ल्म के नि‍र्माता/ नि‍र्देशक के. (कमरुद्दीन) आसि‍फ थे, जि‍नका जन्म‍ 14 अप्रैल 1922 को इटावा में हुआ था, शुरुआती शिक्षा भी यहां के इस्लामि‍यां इंटर कालेज में हुई, उनके नाम से हो रहा फिल्म फेस्टिवल उन्हीं को समर्पित होगा. के. आसिफ का इटावा से बड़ा नाता था.

कौन थे के. आसिफ
फि‍ल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतरे के. आसि‍फ की पहली फिल्म थी फूल जो 1945 में बनकर तैयार हुई. मुगल-ए-आजम को 1960 में दो फिल्म फेयर अवार्ड मि‍ले एक सर्वश्रेष्ठ फिल्म पुरस्कार और दूसरा सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार. डेढ़ करोड़ की लागत से बनी मुगल-ए-आजम ने बॉक्स ऑफिस पर 5.5 करोड़ रुपए कमाए थे. मुगल-ए-आजम, 5 अगस्त 1960 को देश के 150 सिनेमाघरों में एक साथ प्रदर्शि‍त हुई थी, जो उस दौर में एक रिकॉर्ड था. के. आसिफ अगली फि‍ल्‍म ‘लव एंड गॉड’ का नि‍र्माण शुरू कि‍या लेकि‍न, फि‍ल्‍म पूरी हो पाती इससे पूर्व के. आसि‍फ का 49 वर्ष की आयु में 9 मार्च 1971 को निधन हो गया. आखि‍रकार उनकी यह फि‍ल्‍म पत्‍नी ने केसी बोकाडि‍या के सहयोग से पूरी की, जो 1986 में रि‍लीज हुई. इस अजीम शख्सियत को उनके जन्मस्थान पर हो रहे इस तीन दिवसीय आयोजन में शिद्दत से याद किया जाएगा.

k asif film festival

चंबल पुरातात्विक सभ्यता की खान

शाह आलम कहते हैं कि दरअसल, चंबल एक धारा नहीं विचारधारा है. बगावत और बलिदान की. आजादी आंदोलन में अंग्रेजों को सबसे बड़ी चुनौती चंबल के इलाकों में इसी रवायत के चलते मिली. व्यक्तिगत उत्पीड़न और अन्याय के खिलाफ भी बगावत कीअभिव्यक्ति चंबल में जारी रही. बंदूक उठाकर बीहड़ कूदना सरकार, राजनीति और पुलिस के संरक्षण में पोसे जाने वाले जालिमों को मटियामेट करने के संकल्प को परिभाषित करने वाला मुहावरा बन गया. बीहड़ के कोने-कोने में सैकड़ों साल के इतिहास की स्मृतियों को सीने में दबाये भग्नावशेष बिखरे पड़े हैं. 900 किमी लंबी चंबल के साथ दौड़ते बीहड़ों और जंगलों में क्रांतिकारियों, ठगों, बागियों-डाकुओं के न जाने कितने किस्से दफ्न हैं. चंबल की यह रहस्मयी घाटी हिन्दी सिनेमा को हमेशा लुभाती रही है. लिहाजा इस जमीन को फिल्मलैण्ड कहा जाता है. आजादी के बाद चंबल की इस पृष्ठभूमि पर बनी तमाम फिल्में सुपरहिट रहीं.

पर्यटन को बढ़ावा देना लक्ष्य
चंबल की बल खाती वादिया मिट्टी के पहाड़, बागियों के ठिकाने सभी को लुभाती है. सभी को रिझाती है साथ ही सबको डराती भी है. के आसिफ चंबल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दस्तावेजी फिल्मों के मार्फत बीहड़ी समाज की समस्याओं को रेखांकित किया जाएगा. अटेर का किला, भरेह का किला, जगम्मनपुर का किला, पचनदा, मितावली, पड़ावली, ककनमठ, बागियों डाकुओं के ठिकाने, मेहमान परिन्दे, घड़ियाल, डालफिन, चंबल की बलखाती वादियां और पुराने बागियों से मुलाकात कर सकेंगे. पर्यटन के साथ कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया जाएगा.

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