UP Assembly Election 2022: इन 6 फैक्टर्स के ईर्द-गिर्द होंगे उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव, सभी पार्टियों ने झोंकी पूरी ताकत

UP Elections 2022: उत्तर प्रदेश में चुनावी शंखनाद हो चुका है, 403 विधानसभा सीट वाले इस राज्य की सत्ता पर काबिज होने के लिए देश की शीर्ष राजनीतिक दलों के बीच नूरा-कुश्ती का दौर शुरू हो चुका है.

Updated: January 9, 2022 11:57 AM IST

By Nitesh Srivastava

UP Assembly Election 2022
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UP Elections 2022: उत्तर प्रदेश में चुनावी शंखनाद (UP Election Date Announce) हो चुका है, 403 विधानसभा सीट वाले इस राज्य की सत्ता पर काबिज होने के लिए देश की शीर्ष राजनीतिक दलों के बीच नूरा-कुश्ती का दौर शुरू हो चुका है. सत्तारूढ़ बीजेपी (Yogi Government) जहां पांच साल में सरकार कामों को गिनाकर वोटर्स का मन लुभाने की कोशिश में लगी है तो वहीं विपक्ष इन दावों को खोखला बताते हुए सरकार की विफलताओं पर जोर दे रही है. दावों और वादों के अलावा भी कुछ कारक हैं, जो उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.

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ध्रुवीकरण: चुनाव में वोटर्स का ध्रुवीकरण करके वोट बटोरना राजनीतिक दलों का पुराना हथकंडा रहा है. उत्तर प्रदेश भी इससे अछूता नहीं रहा है, यहां जारी बयानबाजी का दौर इसकी बानगी है. पिछले दिनों लखनऊ में हो रहे एक कार्यक्रम में खुद सीएम योगी ने कहा कि यह चुनाव 80 बनाम 20 फीसदी का होगा. राजनीति के जानकार मानते हैं कि चुनावों में AIMIM और ओवैसी की मौजूदगी भी ध्रुवीकरण को हवा दे रही है. हालिया राज्यों में हुए चुनाव में उनका सियासी कद भी बढ़ा है और वोटबैंक भी. इधर अखिलेश यादव, प्रियंका गांधी और मायावती भी योगी सरकार के किलेबंदी में सेंध लगाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं.

जातिवाद: उत्तर प्रदेश का चुनावी इतिहास इस बात का गवाह है कि राज्य की राजनीति में जातियों का क्या महत्व है. हर जाति का अपना एक अलग वोट बैंक है, कुछ जातियों और वर्ग विशेष पर राजनीतिक दलों का प्रभाव भी माना जाता है. यहां ओबीसी मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा 52 फीसदी है. इसी वजह से 1990 के बाद इसका राजनीति में दबदबा बढ़ गया. अब 2022 में पिछड़ा वर्ग में शामिल 79 जातियों पर अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए सियासी रस्साकस्सी तेज होगी. राज्य में सवर्ण मतदाता की आबादी 23 फ़ीसदी है, जिसमें सबसे ज्यादा 11 प्रतिशत ब्राम्हण, 8 फ़ीसदी राजपूत और 2 फ़ीसदी कायस्थ हैं. ऐसे में इन्हें किंगमेकर भी माना जाता है.

कानून व्यवस्था; उत्तर प्रदेश एक घनी आबादी वाला राज्य माना जाता है, यहां की कानून व्यस्था पिछले कई दशकों में सवालों के घेरे में रही है. 2017 में योगी सरकार ने सत्ता में आने के बाद इसे सुधारने के दावे किए, कई बड़े कदम उठाए गए लेकिन इस बीच बड़ी घटनाओं ने राष्ट्रीय स्तर की सुर्खियों में जगह बनाई. सरकार दावे करती रही कि कानून व्यवस्था पर नियंत्रण है लेकिन विपक्ष को लगातार मौके मिलते रहे जिससे सरकार पर सवाल उठाए जा सकें. इन चुनावों में विपक्ष कानून व्यवस्था को लेकर लगातार आक्रामक है. जाहिर है चुनाव में यूपी की कानून व्यवस्था की अपनी एक जगह है.

महंगाई: पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों से लेकर सब्जियों तक की कीमतों में आया उछाल जनता के लिए परेशानी का सबब है. इस मुद्दे को लेकर भी विपक्ष लामबंद है और सरकार गोलमोल जवाब दे रही है. महंगाई का मुद्दा भी चुनावों में जमकर उछाला जाएगा.

कोरोना: कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर में उत्तर प्रदेश में भी हाहाकार की स्थिति बनी थी, अस्पतालों में बेड से लेकर ऑक्सीजन तक के लिए लोग भटकते नजर आए लेकिन सरकार का कहना है कि राज्य में ऑक्सीजन की कमी से किसी की मौत नहीं हुई, जबकि गंगा में तैरती लाशों ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरी थी. इस दाग को धोने के लिए सरकार नए प्रयास कर रही है लेकिन विपक्ष इन तस्वीरों का चुनाव में अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने से गुरेज नहीं करेगा.

मुफ्त का वादा: सत्तारूढ़ बीजेपी जहां चुनावों से पहले जनता को मुफ्त राशन और मोबाइल-टैबलेट दे रही है तो वहीं अन्य दल में सत्ता में आने के लिए तमाम तरह के वादे कर रहे हैं, जिसमें बिजली बिल बकाये की माफी से लेकर मुफ्त तीर्थ यात्रा तक शामिल हैं.

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Published Date: January 9, 2022 11:56 AM IST

Updated Date: January 9, 2022 11:57 AM IST