लखनऊ: लोकसभा उपचुनाव में पहले गोरखपुर-फूलपुर और अब कैराना की हार बीजेपी के मिशन 2019 की उम्‍मीदों के लिए कड़ा झटका है. क्‍योंकि बीजेपी के वादे हकीकत में उतरने न देख जनता में सरकार के प्रति गुस्‍सा बढ़ा है. ऐसे में बीजेपी को नए सिरे से हार की समीक्षा करते हुए जनता के मूड को समझना होगा. अन्‍यथा यूपी की 80 लोकसभा सीटों में उसकी संख्‍या आधे से भी कम होने के आसार हैं. मौजूदा समय में बीजेपी के खिलाफ समूचा विपक्ष एकजुट है. ऐसे में बीजेपी को रणनीति बदलने के साथ ही अपने सहयोगियों की संख्‍या बढ़ानी होगी. साथ ही नए सहयोगी भी तलाशने होंगे.

उपचुनाव: सीट ही नहीं बीजेपी के लिए इस मोर्चे पर भी है चिंता की बड़ी वजह

2014 लोकसभा चुनाव में मोदी लहर और यूपीए सरकार के प्रति जनता के आक्रोश का फायदा बीजेपी को बखूबी मिला था. लेकिन अब विपक्षी पार्टियां बीजेपी को उसी के हिसाब से मात देने में लगी हैं. क्‍योंकि जनता से किए गए अपने वादे बीजेपी सरकार पूरा नहीं कर सकी है. यूपी विधानसभा चुनाव में कर्ज माफी और गन्‍ना किसानों के बकाया भुगतान का वादा सरकार ने जल्‍द पूरा करने का आश्‍वासन दिया था. लेकिन अभी तक किसानों का गन्‍ना बकाया नहीं मिल सका है. जबकि कर्जमाफी में खेल से किसानों में सरकार के प्रति गुस्‍से को बढ़ाने का काम किया है.

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गन्‍ना भुगतान व कर्जमाफी पर पूरे चुनाव बैकफुट पर रहे बीजेपी नेता
कैराना लोकसभा उपचुनाव के दौरान विपक्षी पार्टियां किसानों में गन्‍ना बकाया भुगतान और कर्ज माफी का मुद्दा उठाती रहीं. क्‍योंकि कैराना क्षेत्र में आने वाली विधानसभा सीट कैराना, गंगोह, नकुड़, शामली और थानाभवन के किसनों का करीब आठ सौ करोड़ रुपये चीनी मिलों पर बकाया है. जबकि सरकार ने गन्‍ना देने के 15 दिन बाद किसानों को भुगतान का वादा किया था. इसके चलते पूरे चुनाव के दौरान भाजपा के नेता इन मुद्दों पर बैकफुट पर नजर आए. इस बीच डीजल के डीजल के बढ़ते दामों ने आग में घी डालने का काम किया.

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बदली रणनीति से ही मिलेगी 2019 में जीत
बता दें कि लोकसभा चुनाव में पश्चिमी उत्‍तर प्रदेश की भूमिका काफी अहम मानी जाती है. यहां के पिछले आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा के लिए यह काफी मुफीद रहा है. ऐसे में लोकसभा उपचुनाव में मिली हार ने बीजेपी को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है. क्‍योंकि यहां जातिगज और धार्मिक आधार विशेष मायने रखता है. पश्चिमी यूपी मुस्लिमों के साथ जाट, गुर्जर, राजपूत, वैश्‍य के साथ ही अति पिछड़ा वर्ग बहुल क्षेत्र है. ऐसे में यहां जातिगत आंकड़ों के साथ सांप्रदायिक आधार ही चुनावी गणित तय करता है. कैराना की हार के बाद अब बीजेपी को बदली रणनीति के साथ लोकसभा चुनाव में उतरना होगा. क्‍योंकि यदि उसे पिछले चुनाव के इतिहास को दोहराना है तो उसे जाट वोटों के साथ ही गुर्जर, राजपूत, वैश्‍य जैसे अति पिछड़ों को भी साथ लाना होगा. तभी 2019 का मिशन फतह करने में सफलता मिलेगी.