लखनऊ. सामान्यतः हिंदी में बात करते रहते हैं, लेकिन जैसे ही सवाल हुआ कि ‘हिंदी‘ को आपकी जरूरत क्यों है, ‘हिंदी’ से आपका क्या रिश्ता है, ये सुनते ही मंज़र-उल वासै चहक उठते हैं. उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के शिकोहाबाद के रहने वाले मंज़र की हिंदी पर नज़र इतनी गहरी है कि हिंदू धर्म की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र ‘कैलास मानसरोवर’ की यात्रा के सरकारी विज्ञापन में कैलास की बजाय ‘कैलाश’ प्रकाशित हो गया. इस पर मंज़र सरकार से ‘हिंदी के योद्धा’ की तरह भिड़ गए. उम्र करीब 80 साल है, लेकिन आज भी लगभग पूरे उत्तर प्रदेश के स्कूल, कॉलेज में हिंदी की रचनात्मकता का बखान करने बुलाए जाते हैं. हिंदी के दर्जनों शब्दकोष हैं ही, इस्लाम को मानने वाले मंज़र रामायण, गीता, राम चरितमानस, महाभारत जैसे ग्रंथों का जखीरा अपने पास रखते हैं. और इन ग्रंथों के बड़े जानकार भी हैं. दिलचस्प ये भी है कि लोग उन्हें ‘मंज़र तो है हिंदी की हर बिंदी के विद्वान्, इनके करीब रहते हैं श्रीकृष्ण और राम’ और ‘मंज़र विद्वान्’ के तौर पर भी जानते हैं.

Manzar-ul-wase-Poster

अंग्रेज़ी से पढ़ाई की, 35-40 साल से मिशन है हिंदी
मंज़र-उल वासै ने 1969 में अंग्रेज़ी से एमए किया, लेकिन मन हिंदी में ही रमा, इसलिए 1973 में एक बार फिर एमए किया, वो भी हिंदी में. वह बताते हैं कि ‘लोग हैरत में थे कि अंग्रेज़ी जैसी भाषा, जिसका ज्ञान भी तब कम लोगों को होता था, को छोड़ वह हिंदी की ओर क्यों दौड़ रहे हैं. भारतीय जीवन बीमा निगम में प्रशासनिक अधिकारी रहे मंज़र 1980 के आस-पास हिंदी के लिए जुट गए. हिंदी भाषा पर गहराई से अध्ययन किया. इसके बाद नौकरी करते हुए ही ‘हिंदी यात्रा‘ पर निकल पड़े. स्कूल-कॉलेज या जहां मौका लगा, अपने उद्देश्य को बताते बैनर लगाए, पर्चे बांटे और हिंदी के महत्व को बताने लगे. जब उन्होंने सही हिंदी लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की शुरुआत की थी तब वह युवावस्था में थे और अब उम्र 80 हो चुकी है.

हिन्दी की स्थिति ‘राष्ट्रपति’ जैसी, अंग्रेजी का दर्जा ‘प्रधानमंत्री’ जैसा

आज की पीढ़ी गलत पढ़ेगी, तो आने वाली पीढ़ी भी गलत लिखेगी
हिंदी यात्रा की जरूरत क्यों पड़ी, के सवाल पर मंज़र कहते हैं कि हिंदी लिखने-पढ़ने में बेशुमार गलतियां की जाती हैं. बच्चों की किताबों में ‘जन-गण-मन’ में बिना समास लगाए ‘जन गण मन’ लिख देते हैं. इसी तरह सिंधु की बजाय सिंध छाप देते हैं. ये गलत है. हिंदी में एक हलंत की गलती पर अध्यापक छात्र का अगर एक नंबर भी काटेगा तो उस एक नंबर भर से ही छात्र योग्यता सूची में ऊपर से बहुत नीचे आ सकता है. इसका बड़ा नुकसान होगा. इससे भाषा तो विकृत हुई ही और छात्र का उद्देश्य भी. अक्सर ऐसी गलतियां होती हैं. अख़बार आज भी कैलास (कैलास मानसरोवर) को कैलाश छाप देते हैं. करीब एक साल पहले अखबारों में सरकार की ओर से इसके बारे में छपा, और कैलास को कैलाश लिख दिया. उन्होंने इसे लेकर अख़बारों को नोटिस भेजे. अधिकारियों सहित सीएम योगी को भी पत्र लिख डाला. इससे पहले गलतियों पर तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव को भी पत्र लिखे. इन सभी ने अपनी गलती मानी. वह कहते हैं कि आज फेसबुक पोस्ट शेयर होते हैं. ट्वीट-रीट्वीट होते हैं. नई पीढ़ी गलत पढ़ेगी, गलत लिखेगी तो आने वाली पीढ़ी को भी गलत ही बताएगी. इस तरह भाषा का स्वरूप प्रदूषित होने की संभावना रहेगी. कैलास मानसरोवर की यात्रा के बारे में कौन नहीं जानता, फिर भी गलत लिखा गया.

Manzar-ul-wase-Award

‘लोग हिचकते थे कि हिंदी के लिए कहीं रुपए न मांगने लगूं’
मंज़र बताते हैं कि हिंदी के लिए जब कहीं पहुंचते थे तो लोग हिचकते थे कि कहीं रुपए न मांगने लगें. फीस की न कहें. लोगों को आश्वस्त करना पड़ता था कि वह हिंदी के लिए कोई मेहनताना नहीं लेते. वह कहते हैं कि अब स्कूल कॉलेज से उनके पास खुद ही बुलावे आते हैं. हिंदी के शब्दों को लेकर संशय होने पर छात्र घर ही आ जाते हैं. यूपी भर में जाते हैं. उन्हें अच्छा लगता है कि उनकी कोशिश को सराहना मिली है. बच्चे असली खेवनहार है. अगली पीढ़ी तक ले जाएंगे. युवा पीढ़ी गंभीर है तो फिर हिंदी की चिंता की आवश्यकता नहीं. ये देश हिंदी है. हिंदी देश के रग-रग में है. अंग्रेज़ी या दूसरी भाषा कितनी भी बढ़ जाए, लेकिन हिंदी के मुकाबले कहीं नहीं ठहरती.