ऋषिकेश: हरिद्वार-ऋषिकेश-कांसरौ के बीच ‘किलर ट्रैक’ के रूप में कुख्यात 18 किलोमीटर लंबे रेलवे ट्रैक पर जंगली हाथियों सहित अन्य वन्यजीवों को रेलगाड़ियों की टक्कर से बचाने के लिए मिट्टी के कच्चे रैम्प बनाकर जमीन का समतलीकरण किया जा रहा है.Also Read - Free Ayodhya Darshan: राम लला के दर्शन करना चाहते हैं? मुफ्त होगा आना-जाना और रहना-खाना; जानें

Also Read - IRCTC Bharat Darshan : आज एक नई 'भारत दर्शन' पर्यटक ट्रेन की शुरुआत करेगा IRCTC, यहां जानें पूरी इंफॉर्मेशन

राजाजी टाईगर रिजर्व (आरटीआर) के निदेशक सनातन सोनकर ने बताया कि रेलवे ट्रैक पर वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए प्रभावी उपाय किये जा रहे हैं. जिसके तहत रिज़र्व की मोतीचूर रेंज और कांसरौ रेंज में चिन्हित किये गए 15 में से सात स्थानों पर कच्चे रैम्प तैयार कर दिये गये हैं. जंगली हाथियों के आवागमन के पारंपरिक गलियारे माने जाने वाले इन स्थानों पर पहले रेल ट्रैक और जमीन के बीच औसतन एक मीटर की ऊंचाई थी. इस कारण रेलगाड़ी के आने की स्थिति में हाथियों के झुण्ड के किशोर व शावक जल्दी नहीं उतर पाते थे. इनके सुरक्षित उतरने तक ट्रैक पर इंतजार में खड़े हाथी अक्सर दुर्घटना का शिकार हो जाते थे. Also Read - Indian Railway/IRCTC: बिहार में रेलवे ट्रैक पर पहुंचा बाढ़ का पानी, समस्तीपुर-दरभंगा रूट पर कैंसिल की गईं कई ट्रेनें, देखें Full List

योगी सरकार का दिव्‍यांगजनों को तोहफा, सरकारी नौकरी में चार प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला

ट्रैक पर रेलगाड़ियों से टकराकर पिछले 18 वर्षों में 25 हाथियों की मौत

इस ट्रैक पर रेलगाड़ियों से टकराकर पिछले 18 वर्षों में 25 हाथियों की मौत हो चुकी है. निदेशक सोनकर ने बताया कि 2015 में रेल पथ पर विद्युतीकरण का काम शुरू होने के समय ही उत्तराखंड वन विभाग, देहरादून स्थित वन्य जीव संस्थान और डब्लूडब्लूएफ़ ने संयुक्त अध्य्यन कर हरिद्वार और कांसरौ के सुसवा रेल पुल के बीच 15 स्थान चिन्हित किये थे. ये वे स्थान थे जहाँ से जंगली हाथियों का अक्सर आवागमन होता है लेकिन वे ऊबड़खाबड़ व विषमतल थे.

मिट्टी के कच्चे रैम्प से गुजरने लगे हैं वन्‍यजीव

पहले इन स्थानों पर सीमेंटेड रेम्प बनाने की बात कही गयी थी लेकिन कांसरौ रेलवे स्टेशन पर बने सीमेंटेड रैम्प का इस्तेमाल हाथियों द्वारा कभी न किये जाने के मद्देनजर उनके लिए मिट्टी के प्राकृतिक रैम्प बनाये जाने की उपयोगिता समझी गयी. सोनकर ने बताया कि नव निर्मित मिट्टी के इन रैम्पों को अपने प्राकृतिकवास का हिस्सा मानकर हाथियों व अन्य वन्यजीवों ने इससे होकर गुजरना भी शुरू कर दिया है जिसकी पुष्टि कैमरे से हुई है.

30 जून को पूरा हो गया रैम्प बनाने का काम

रिजर्व के निदेशक ने बताया कि इन सात रैम्प के निर्माण में मात्र साढ़े तीन लाख रुपये का व्यय आया। इन सात रैम्प के निर्माण का काम एक जून को शुरू हुआ जो 30 जून तक पूरा भी हो गया. उन्होंने बताया कि शेष आठ स्थानों पर रैम्प बनाने के लिये भारत सरकार की गज परियोजना से बजट की प्रतीक्षा की जा रही है. (इनपुट एजेंसी)