लखनऊः इस साल अप्रैल-मई में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश का सियासी गणित उलझ गया है. राज्य में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच संभावित गठजोड़ ने भाजपा को थोड़ा परेशान किया है. वहीं कांग्रेस के रुख को लेकर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं है. सपा और बसपा के बीच गठजोड़ में कांग्रेस को जगह नहीं मिल रही है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा विरोधी गठबंधन बनाने में जुटी कांग्रेस खुद सपा-बसपा से दूरी बनाना चाहती है या फिर सपा-बसपा ही उसे भाव नहीं दे रही हैं.

दरअसल, यूपी में भाजपा विरोधी गठबंधन को लेकर कांग्रेस मजधार में फंस गई है. इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक सपा, बसपा और यहां तक कि भाजपा के भी नेताओं का मानना है कि अगर कांग्रेस राज्य में अकेले चुनाव लड़ती है तो उन्हें फायदा होगा. राज्य में सपा-बसपा को लगता है कि कांग्रेस के अकेल चुनाव लड़ने से उनके वोटबैंक पर असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि उसके वोटर अगड़ी जातियां हैं. वहीं भाजपा का मानना है कि अगर कांग्रेस अकेले चुनाव लड़ेगी तो वह अल्पसंख्यक वोटों में विभाजन कर सकती है. ऐसे में उसका रास्ता आसान हो जाएगा.

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सपा ने खीख लिया सबक
सपा नेताओं का मानना है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन कर पार्टी ने सबक सीख लिया है. सपा और कांग्रेस दोनों के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि कांग्रेस का वोट बैंक मुख्य रूप से अगड़ी जातियां और ब्राह्मण हैं. 2017 में जब सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया तो अधिकतर अगड़ी जातियों ने भाजपा के लिए वोट किया. ये एक ऐसा वोट बैंक है जो सपा से घृणा करता है लेकिन साथ ही भाजपा को नापसंद भी करता है. ऐसे में सपा-कांग्रेस के साथ आने पर ये भाजपा को अपने लिए ज्यादा मुफीद समझता है. अगर कांग्रेस गठबंधन से बाहर रहेगी तो ऐसी स्थिति नहीं बनेगी. कांग्रेस अगड़ी जातियों के वोट बांटने में कामयाब होगी. इससे भाजपा को ज्यादा नुकसान होगा, जबकि सपा-बसपा की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

इसको लेकर कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने दावा कि वे राज्य में बसपा से ज्यादा सीटें जीतेंगे. कई सीटों पर सपा से साथ दोस्ताना मुकाबला होगा. उन्होंने कहा कि आपको याद रखना चाहिए कि 2009 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने राज्य की 22 सीटों पर जीत हासिल की थी. उस वक्त भी उसने अकेले चुनाव लड़ा था. उन्होंने कहा कि आज की तारीख में कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के विकल्प के रूप में देखा जा रहा है. ऐसे में राज्य में पार्टी को इसका भी फायदा मिलेगा.

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पड़ सकता है नकारात्मक असर
सपा के भी एक वरिष्ठ ने कुछ ऐसी ही बातें कही. उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी गठबंधन में शामिल होकर उसे मजबूत नहीं करेगी, उलटे वह सपा-बसपा के वोटों पर नकारात्मक असर डालेगी. उक्त नेता ने कहा कि सपा के वयोवृद्ध नेता मुलायम सिंह यादव ने भी इसी आधार पर विधानसभा चुनाव में गठबंधन से बचने की सलाह दी थी. उन्होंने ये भी कहा कि गठबंधन की स्थिति में कांग्रेस ज्यादा जगह की मांग करती, जैसा कि हमने 2017 में उसे विधानसभा की एक चौथाई सीटें दी थीं. इस आधार पर वह लोकसभा में 15-20 सीटों की मांग कर सकती थी. उसे इतनी सीटें देना असंभव था. इसके साथ ही कांग्रेस को गठबंधन में शामिल करने पर राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच पर्सनाल्टी क्लैश (व्यक्तित्व के स्तर पर टकराव) भी हो सकता था.

उन्होंने कहा कि दलित, पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम वोट बैंक के आधार पर सपा-बसपा गठबंधन राज्य की किसी भी सीट पर जीत हासिल करने का दम रखता है. ऐसा उपचुनावों में साबित भी हो चुका है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ रहे गोरखपुर, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के क्षेत्र फूलपुर और कैराना में ये साबित भी हो चुका है.