नई दिल्‍ली: उत्‍तर प्रदेश के मथुरा की कोर्ट ने आज बुधवार को कृष्‍ण जन्‍मभूमि के पास मस्जिद को हटाने की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का हवाला देते हुए याचिका को विचार करने के लिए अयोग्‍य बताया है. अब याचिकाकर्ता इस मामले को हाईकोर्ट ले जाने की तैयारी में हैं. Also Read - मिसाल: जब रामपुर में थानों की थानेदारी संभाली बेटियों ने, बदला बदला सा दिखा माहौल

याचिकाकर्ता ने बताया कि माननीय अदालत ने याचिका पर विचार करने के लिए कोई स्वीकार्य आधार नहीं पाया और इसलिए इसे खारिज कर दिया गया है. अब हम इस मामले को उच्च न्यायालय में ले जाएंगे और न्याय पाने की उम्मीद करेंगे. Also Read - कमाल है: उप्र में अनुमति के बिना दाढ़ी रखने पर मुस्लिम पुलिसकर्मी निलंबित

उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद में स्थित श्रीकृष्ण जन्मस्थान मामले में आज यहां अपर जिला जज एवं त्वरित अदालत में सुनवाई हुई.

वादी पक्ष की आरे से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीशंकर जैन और अधिवक्ता विष्‍णु शंकर जैन ने बताया कि उन्होंने बाहरी व्यक्तियों द्वारा यहां इस मसले पर याचिका दाखिल किए जाने से संबंधित सवाल पर अदालत को आईपीसी की धारा 16 एवं 20 का हवाला दिया ओर कहा कि यह हर भारतीय नागरिक का अधिकार है कि वह कहीं भी किसी भी जनपद में अपनी फरियाद कर सकता है.

वकील ने बताया कि याचिका की सुनवाई के लिए अदालत में राम मंदिर से संबंधित मामले में न्यायालय के फैसले के पैरा 116 का हवाला दिया और कहा कि मंदिर निर्माण की संकल्पना अमिट ओर अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर है. महामना मदन मोहन मालवीय आदि द्वारा ली गई यह संकल्पना मंदिर निर्माण के पश्चात भी कायम है.

वकील ने सुनवाई में श्री कृष्ण जन्मस्थान और कटरा केशवदेव परिसर में भगवान कृष्ण का भव्य मंदिर बनाए जाने से संबंधित इतिहास का सिलसिलेवार ब्यौरा देते हुए कहा कि श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान को शाही ईदगाह प्रबंधन समिति से किसी भी प्रकार का कोई हक ही नहीं था. इसलिए उसके द्वारा किया गया कोई भी समझौता अवैध है. इसके साथ शाही ईदगाह निर्माण के लिए कब्जाई गई भूमि पर उसका कब्जा अनधिकृत है. वकील ने कृष्ण सखी के रूप में याचिकाकर्ता रंजना अग्निहोत्री की मांग का समर्थन करते हुए संपूर्ण भूमि का कब्जा श्रीकृष्ण विराजमान को सौंपने का अनुरोध किया है.

बता दें कि लखनऊ निवासी अधिवक्ता रंजना अग्निहोत्री एवं पांच अन्य ने स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण का परमभक्त बताते हुए उनकी ओर से सिविल जज (सीनियर डिवीजन) छाया शर्मा की अदालत में वाद दायर किया था. इसमें कहा गया है कि वर्ष 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान ने मंदिर के परिसर में स्थित शाही ईदगाह मस्जिद की प्रबंध समिति के साथ जो समझौता किया था, वह कानूनी रूप से गै़रवाजिब है क्योंकि, सेवा संस्थान जब उक्त 13.37 एकड़ भूमि का मालिक ही नहीं था तो उसे किसी व्यक्ति अथवा संस्था के साथ इस प्रकार कोई भी करार करने का अधिकार नहीं था. यह समझौता अदालत द्वारा 20 जुलाई 1973 को डिक्री किया गया था.

वादियों द्वारा याचिका में इस करार को निरस्त करते हुए शाही ईदगाह वाली भूमि को मुक्त कराने और इसे विराजमान ठा. श्रीकृष्ण को सौंपने का आदेश देने का अनुरोध किया गया था. इस मामले में शाही ईदगाह ट्रस्ट मैनेजमेंट कमेटी, उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल बोर्ड, श्रीकृष्ण जन्मस्थान ट्रस्ट व श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान को पक्षकार बनाया गया.