Mayawati New Social Engineering Formula: पिछले करीब एक दशक से उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी जगह तलाश रहीं बसपा सुप्रीमो मायावती एक बार फिर 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई हैं. वह 2022 के चुनाव को ध्यान में रखकर ही राज्य में सोशल इंजीनियरिंग के नए फॉर्मूले को आजमा रही हैं. दरअसल, हाल में संपन्न उपचुनावों में पार्टी के बेहद खराब प्रदर्शन के बाद मायावती को लगने लगा है कि मौजूदा रणनीति और सोशल इंजीनियरिंग से 2022 की जंग को पार पाना आसान नहीं है. ऐसे में वह संगठन को नए सिरे से दुरुस्त कर रही हैं. Also Read - किसानों के समर्थन में आईं मायावती, कहा- कृषि कानूनों पर पुनर्विचार हो

पिछले दिनों बसपा सुप्रीमो की ओर से भीम राजभर को पार्टी की उत्‍तर प्रदेश इकाई का नया अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा (Mayawati Dalit+OBC Formula) को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है.  मायावती ने ट्वीट किया था कि राजभर समाज के पुराने, कर्मठ, अनुशासित सिपाही एवं मऊ निवासी भीम राजभर को बसपा उत्‍तर प्रदेश राज्‍य इकाई का नया प्रदेश अध्‍यक्ष नियुक्‍त किया गया है. Also Read - BSP सांसद पर रेप का आरोप लगाने वाली लड़की के खिलाफ FIR दर्ज, जानें क्या है मामला...

उपचुनाव में बुरा प्रदर्शन

अभी तक राज्‍यसभा के पूर्व सदस्‍य मेरठ निवासी मुनकाद अली बसपा के प्रदेश अध्‍यक्ष थे. हाल में हुए विधानसभा उपचुनाव में बसपा का प्रदर्शन 2017 के मुकाबले कमजोर रहा है. उपचुनाव में बसपा सात विधानसभा क्षेत्रों में से सिर्फ एक पर दूसरे स्‍थान पर रही, जबकि 2017 में हुए आम चुनाव में इन सात में से तीन सीटों पर दूसरे स्‍थान पर थी. यह अलग बात है कि बसपा इन सातों में से 2017 में भी कोई सीट जीत नहीं सकी थी. Also Read - भीम राजभर बने BSP की उत्तर प्रदेश इकाई के नए अध्‍यक्ष, मायावती ने ट्वीट कर दी जानकारी

उपचुनाव में बांगरमऊ, देवरिया, टूंडला, बुलंदशहर, नौगांव सादात और घाटमपुर सीटों पर भाजपा को और मल्‍हनी सीट पर सपा को जीत मिली है. उपचुनाव के परिणाम में बसपा सिर्फ बुलंदशहर में दूसरे स्‍थान पर रही, जबकि 2017 में बसपा के उम्‍मीदवार बुलंदशहर, टूंडला और घाटमपुर में दूसरे स्‍थान पर थे.

पार्टी के अपेक्षाकृत खराब प्रदर्शन के बाद बसपा के भीतर इस बात पर राय बनती दिख रही है कि अब मुसलमान वोटरों के लिए बसपा पहली पसंद नहीं है. बसपा पिछले कुछ सालों से मुसलमान वोटरों को साधन की कोशिश कर रही थी. इसी क्रम में उसने मुस्लिम समाज के तीन नेताओं मुनकाद अली, समशुद्दीन राइन और कुंवर दानिश अली को आगे बढ़ाया, लेकिन ऐसा लगता है कि उप चुनावों में मुस्लिम वोटरों ने पार्टी को वोट नहीं दिया. बसपा ने उपचुनाव वाली 7 में से दो सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे लेकिन पार्टी का प्रदर्शन काफी खराब रहा. (Muslims Excluded from Mayawati New Social engineering Formula) इस कारण पार्टी सुप्रीमो अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर हुई हैं.

नया प्रयोग

बसपा ने भीम राजभर में पिछड़े वर्ग के नेता को प्रदेशाध्यक्ष बनाया है. इससे पहले भी पार्टी में पिछड़े वर्ग से रामअचल राजभर और आरएस कुशवाहा प्रदेशाध्यक्ष रह चुके हैं.

2007 में पहली बार काम आया था सोशल इंजीनियरिंग

दरअसल, 2007 में बसपा एक यूनिक सोशल इंजीनियरिंग को अपनाकर सत्ता में आई थी. उस वक्त वह दलित, पिछड़े और ब्राह्मण समाज को एक मंच पर लाकर सत्ता में वापसी में कामयाब हुई थी. लेकिन 2012 में उसका ये सोशल इंजीनियरिंग दरक गया और वह विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार गई. इसके बाद से ही पार्टी अपने एक लिए एक सोशल इंजीनियरिंग की तलाश कर रही है.