लखनऊ : प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले खाली कराने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अपने-अपने बंगले बचाने की जुगत में लगे हुए हैं. हालांकि यूपी सरकार भी सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की काट ढूंढने में लगी हुई है. क्योंकि बीजेपी के भी दो दिग्गज नेताओं के बंगले भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते फंसे हुए हैं. इसी क्रम में आजमगढ़ से सपा सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की है. Also Read - फिर बिगड़ी मुलायम सिंह यादव की तबीयत, मेंदाता हॉस्पिटल में किए गए भर्ती; दो दिन पहले ही हुए थे डिस्चार्ज

बुधवार को सीएम योगी से मुलाकात का समय लेकर मुलायम सिंह उनके आवास पर पहुंचे. योगी और मुलायम की ये मुलाकात तकरीबन आधे घंटे चली. सूत्रों के मुताबिक मुलायम ने सीएम योगी से अपने और अखिलेश यादव के बंगले को बचाने का आग्रह किया. चूंकि आवासों का आवंटन वरिष्ठ विधायकों के नाम हो सकता है इसलिए मुलायम ने अपने और अखिलेश के बंगले को बचाने के लिए दो वरिष्ठ विधायकों के नाम भी सीएम योगी को सौंपे. मुलाकात में मुलायम ने मुख्यमंत्री योगी से 4 और 5 विक्रमादित्य मार्ग पर स्थित अपने और अखिलेश के सरकारी बंगलों को नेता प्रतिपक्ष राम गोविंद चौधरी और नेता विधान परिषद अहमद हसन के नाम पर अलॉट करने का आग्रह किया. Also Read - सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव की तबियत बिगड़ी, अस्पताल में भर्ती

ये था मामला
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अखिलेश यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में बने यूपी सरकार के उस कानून को रद्द कर दिया है जिसके तहत प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन आवासीय बंगला देने का प्रावधान किया गया था. वर्तमान में एनडी तिवारी, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, मायावती से लेकर अखिलेश यादव तक छह पूर्व मुख्यमंत्री सरकारी बंगलों पर काबिज हैं. पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवंटित इन भारी- भरकम सरकारी बंगलों का रखरखाव भी सरकारी खजाने से होता है. राज्य संपत्ति विभाग इसके लिए सालाना बजट आवंटित करता है. इनका बेहद मामूली किराया वसूला जाता है जबकि हर साल इनके रख रखाव पर लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं. Also Read - शिवपाल ने मुलायम कुनबे में एकता का राग अलापा, कहा- अखिलेश को फिर से सीएम के रूप में देखने की चाहत

जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज किया अधिनियम
सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने लोकप्रहरी संस्था की तरफ से दाखिल एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ये फैसला दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने 7 मई को राज्य सरकार द्वारा बनाए गए उत्तर प्रदेश  मंत्री (वेतन, भत्ता और प्रकीर्ण) (संशोधन) अधिनियम को अवैध बताते हुए खारिज कर दिया था.