Opinion : अखिलेश को अपने ही कार्यकर्ताओं पर भरोसा नहीं! 'क्या बोलना है, क्या नहीं' का नोट सपा की बेकाबू राजनीति की कहानी

Written By: Rishabh Kumar Updated by: Rishabh Kumar
Updated Date:August 15, 2026 7:33 PM IST

Opinion: अखिलेश यादव ने चुनाव से पहले सपा नेताओं और कार्यकर्ताओं को क्या बोलना है इसका नोट देने की बात कही. इससे पार्टी अनुशासन और संगठन पर सवाल उठते हैं.

डॉ. अभय पाण्डेय: स्वतंत्रता दिवस के मौके पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की. चुनावी तैयारियों को लेकर उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को पूरी ताकत से मैदान में उतरने का संदेश दिया. अखिलेश ने कहा कि अब चुनाव की तैयारियों के लिए केवल 100 दिन बचे हैं और कार्यकर्ताओं को पूरी तैयारी के साथ जुट जाना चाहिए. लेकिन इसी दौरान अखिलेश ने जो बात कही, वह सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी के संगठन और उसके राजनीतिक कल्चर पर भी सवाल खड़े करती है.

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अखिलेश ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को साफ संदेश दिया कि ऐसी कोई बात न करें, जिससे माहौल खराब हो. उन्होंने यहां तक कहा कि छोटे-बड़े नेताओं को एक नोट दिया जाएगा, जिसमें बताया जाएगा कि क्या बोलना है, क्या नहीं बोलना है और किन मुद्दों पर बीजेपी को घेरना है.

सवाल यही है कि आखिर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को अपने ही नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए यह लिखकर क्यों बताना पड़ रहा है कि उन्हें बोलना क्या है? क्या पार्टी के नेता खुद इतना भी तय नहीं कर सकते कि सार्वजनिक मंच पर क्या कहना है और क्या नहीं?

या फिर अखिलेश यादव को खुद पता है कि अगर अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को खुला छोड़ दिया गया तो उनके कार्यकर्ता इतने बेअंदाज हैं कि वे माहौल खराब कर देंगे, उलटा-सीधा बयान देंगे, गुंडागर्दी करेंगे और दूसरी जातियों के साथ अभद्रता करेंगे? क्या यही वजह है कि चुनाव बीजेपी के खिलाफ कम और सपा की अपनी बयानबाजी के खिलाफ ज्यादा हो सकता है?

अखिलेश को बीजेपी से ज्यादा अपने ही लोगों की जुबान का डर क्यों?

चुनाव से ठीक पहले किसी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अपने कार्यकर्ताओं से मुद्दों पर बात करे, बूथ की तैयारी समझाए और जनता के बीच जाने की रणनीति बनाए-यह सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है. लेकिन यहां मामला अलग है.

अखिलेश यादव को यह चिंता करनी पड़ रही है कि उनके नेता और कार्यकर्ता अपने मन से कुछ ऐसा न बोल दें, जिससे माहौल खराब हो जाए. यानी बीजेपी को घेरने की रणनीति बनाने से पहले ही उन्हें अपने संगठन की जुबान पर पहरा लगाना पड़ रहा है.

यह छोटी बात नहीं है. किसी भी राजनीतिक दल के अनुशासन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसका नेतृत्व हर छोटे-बड़े नेता को सार्वजनिक रूप से क्या बोलना है और क्या नहीं, यह बताने के लिए मजबूर है या नहीं. जहां हर बयान के लिए स्क्रिप्ट देनी पड़े, वहां समस्या सिर्फ बयानबाजी की नहीं होती. वहां नेतृत्व की पकड़ और संगठन के अनुशासन पर भी सवाल खड़ा होता है.

अगर कार्यकर्ता खुद सीमा नहीं समझते तो यह सिर्फ कार्यकर्ता की गलती नहीं

राजनीतिक दलों में हजारों-लाखों कार्यकर्ता होते हैं. हर कार्यकर्ता की जुबान पर नियंत्रण रखना किसी भी नेतृत्व के लिए संभव नहीं है. लेकिन मजबूत संगठन की पहचान यह होती है कि कार्यकर्ता को खुद पता होता है कि पार्टी की लाइन क्या है और उसकी एक गलत टिप्पणी से पूरे संगठन को नुकसान हो सकता है.

सपा में अगर राष्ट्रीय अध्यक्ष को बार-बार यह समझाना पड़ रहा है कि भाषा संभालिए, व्यवहार संभालिए और अब तो बाकायदा नोट बनाकर यह बताने की बात करनी पड़ रही है कि क्या बोलना है और क्या नहीं, तो सवाल सिर्फ कार्यकर्ताओं पर नहीं उठता.

सवाल उस राजनीतिक संस्कृति पर उठता है, जिसमें कार्यकर्ता पार्टी की लाइन से ज्यादा अपनी व्यक्तिगत आक्रामकता को महत्व देने लगता है.

यह पहली बार नहीं है जब अखिलेश को अपने लोगों को समझाना पड़ा हो

अखिलेश यादव पहले भी अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं से भाषा और व्यवहार पर संयम रखने की अपील कर चुके हैं. कई मौकों पर वह यह संदेश दे चुके हैं कि पार्टी के लोग ऐसी बयानबाजी न करें, जिससे किसी व्यक्ति या समाज को ठेस पहुंचे या विवाद पैदा हो.

लेकिन अगर चेतावनी बार-बार देनी पड़े तो फिर यह सवाल स्वाभाविक है कि समस्या आखिर खत्म क्यों नहीं हो रही? एक बार समझाना नेतृत्व है, बार-बार समझाना मजबूरी बन जाए तो यह संगठन की समस्या है. और यही समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ा सवाल है.

सपा की पुरानी छवि का बोझ आज भी खत्म नहीं हुआ

समाजवादी पार्टी को लंबे समय से उसके कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं की आक्रामक भाषा, दबंगई और विवादित व्यवहार को लेकर आलोचना झेलनी पड़ती रही है. यहां तक कि सपा के विरोधी अक्सर पार्टी पर आरोप लगाते रहे हैं कि उसके कुछ कार्यकर्ता सत्ता और संगठन के प्रभाव को अपनी मनमानी की ताकत समझ लेते हैं.

अखिलेश यादव इस छवि को बदलने की कोशिश करते रहे हैं. लेकिन जब चुनाव से ठीक पहले वही राष्ट्रीय अध्यक्ष अपने नेताओं को यह समझाने लगे कि कुछ भी अपने मन से मत बोलना, तो यह सवाल फिर सामने आ जाता है कि क्या पार्टी वास्तव में अपनी पुरानी कार्यशैली से बाहर निकल पाई है?

अखिलेश का 'नोट' वाला बयान बहुत कुछ कहता है

अखिलेश यादव का यह कहना कि छोटे-बड़े नेताओं को नोट दिया जाएगा कि क्या बोलना है और क्या नहीं, सुनने में भले ही चुनावी रणनीति का हिस्सा लगे, लेकिन इसके भीतर एक गहरी चिंता दिखाई देती है. उन्हें पता है कि चुनाव के दौरान पार्टी का कोई एक नेता कुछ ऐसा बोल सकता है, जिससे विपक्ष को महीनों का मुद्दा मिल जाए.

उन्हें पता है कि सोशल मीडिया के दौर में किसी कार्यकर्ता का कुछ सेकेंड का वीडियो पूरे प्रदेश में घूम सकता है. इसलिए वह पहले से अपने नेताओं की जुबान बांधना चाहते हैं. लेकिन यही तो सवाल है- क्या सपा अपने कार्यकर्ताओं को राजनीतिक रूप से इतना प्रशिक्षित नहीं कर पाई कि उन्हें अब भी लिखित निर्देश देना पड़ रहा है?

आखिर इसकी वजह क्या है?

सपा सरकार के दौरान प्रदेश में ऐसे कई किस्से सामने आते रहे, जब माफियागिरी और दंगे कानून-व्यवस्था की बड़ी चुनौती बने हुए थे. सपा के नेताओं पर भी कई मामले दर्ज हुए. उसकी बेअंदाजी का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता है कि आज भी सपा की गुंडई के किस्से लोगों के जेहन में हैं.

अब करीब 10 साल से सपा सत्ता से बाहर है, लेकिन आज भी उसके कार्यकर्ताओं और नेताओं के बयान सुर्खियों में रहते हैं. कभी ब्राह्मणों को लेकर अपमानजनक बातें सामने आती हैं, तो कभी सत्ता में आते ही खुली धमकी देने की भाषा सुनाई देती है. कभी-कभी तो सपा के कार्यकर्ता अपनी ही पार्टी के नेता और विधायकों को धमकाते हुए नजर आते हैं. इसलिए समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ विपक्ष से मुकाबला करना नहीं, बल्कि अपने भीतर की इसी अनुशासनहीनता को खत्म करना भी है.

सपा के सामने असली चुनौती सिर्फ बीजेपी नहीं है

अखिलेश यादव 2027 में बीजेपी को चुनौती देने की तैयारी कर रहे हैं. वह पीडीए, सामाजिक न्याय, रोजगार, महंगाई और दूसरे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरना चाहते हैं. लेकिन इन मुद्दों का असर तभी होगा, जब पार्टी उन्हें एकजुट होकर जनता तक पहुंचाएगी. अगर हर दूसरा नेता अपनी अलग लाइन लेकर खड़ा हो जाए, तो पार्टी का पूरा संदेश कमजोर पड़ जाएगा.

यही वजह है कि अखिलेश का बयान सिर्फ कार्यकर्ताओं के लिए एक निर्देश नहीं है. यह सपा के संगठन की मौजूदा स्थिति का आईना भी है. एक तरफ राष्ट्रीय अध्यक्ष कह रहे हैं कि चुनाव के लिए सिर्फ 100 दिन बचे हैं. दूसरी तरफ उन्हें यह चिंता करनी पड़ रही है कि उनके अपने लोग कुछ ऐसा न बोल दें, जिससे माहौल खराब हो जाए.

यानी बीजेपी से चुनावी लड़ाई शुरू होने से पहले अखिलेश यादव को अपने ही संगठन के भीतर अनुशासन की लड़ाई लड़नी पड़ रही है.

और यह पहली बार नहीं है, जब सपा प्रमुख ने अपने कार्यकर्ताओं को इस तरह की नसीहत दी हो. इसके बावजूद उनके कार्यकर्ताओं की बेअंदाजी सामने आती रहती है. यानी सवाल यह भी है कि क्या अखिलेश यादव की अपने ही कार्यकर्ताओं पर कोई प्रभावी लगाम है?

अखिलेश यादव बीजेपी से मुकाबले की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन उससे पहले उन्हें यह साबित करना होगा कि वह अपनी पार्टी को संभाल सकते हैं. क्योंकि चुनावी मैदान में विपक्ष से मुकाबला करना एक चुनौती है, लेकिन अपने ही कार्यकर्ताओं की जुबान, व्यवहार और बेअंदाजी पर लगाम लगाना उससे भी बड़ी चुनौती बन जाए, तो सवाल सिर्फ कार्यकर्ताओं पर नहीं, पूरे संगठन और नेतृत्व पर उठता है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं. ये लेखक के अपने विचार है.)

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