Opinion: क्या गैर-यादव पिछड़ों का भरोसा खो रही है सपा? अखिलेश क्यों नहीं बदल पा रहे 'यादव पार्टी' वाली छवि

Written By: India.com Hindi News Desk Updated by: Parinay Kumar
Updated Date:May 29, 2026 6:39 PM IST

अखिलेश यादव ने PDA को मजबूत करने के लिए श्याम पाल को प्रदेश अध्यक्ष और सीमा राजभर को महिला सभा का अध्यक्ष नियुक्त किया. पार्टी में रुक्मिणी देवी निषाद की भी नियुक्ति हुई, लेकिन जमीन पर सपा का ये प्रयोग सफल होता नहीं दिखता है.

डॉ. निधीश कुमार सिंह | उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. करीब एक दशक से सत्ता से बाहर चल रही समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बीजेपी के खिलाफ अपनी पूरी राजनीति PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के फॉर्मूले पर खड़ी की है. मंच से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक, अखिलेश लगातार दावा करते हैं कि बीजेपी सरकार में PDA के साथ अन्याय हो रहा है और समाजवादी पार्टी ही इन वर्गों की असली राजनीतिक आवाज है. अपने PDA को मजबूत करने के लिए अखिलेश यादव ने श्याम पाल को प्रदेश अध्यक्ष और सीमा राजभर को महिला सभा का अध्यक्ष तक नियुक्त किया. इसी क्रम में रुक्मिणी देवी निषाद की भी नियुक्ति हुई, लेकिन जमीन पर सपा का ये प्रयोग सफल होता नहीं दिखता है. समय-समय पर ऐसी घटनाएं होती हैं जो ये साबित करती हैं कि अखिलेश की पार्टी में आज भी एक ही जाति और एक ही वर्ग का वर्चस्व है. अखिलेश की तमाम अपीलों और कोशिशों के बाद भी उनके कार्यकर्ता बेअंदाज दिख रहे हैं, जिससे उनका मकसद कमजोर हो रहा है.

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पिछले चार दिनों में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आई चार घटनाओं के जरिए ही अगर समझने की कोशिश करें तो समझ पाएंगे कि कैसे अखिलेश का ये PDA मॉडल केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह गया है और जमीन पर इसका असर दिख नहीं रहा. बल्कि पीडीए समाज के भीतर से ही इसपर सवाल खड़े होने लगे हैं. अमेठी, लखनऊ, मऊ और चंदौली से सामने आई घटनाओं ने उस पुराने आरोप को हवा दे दी है कि क्या समाजवादी पार्टी सच में PDA की पार्टी बन पाई है या आज भी उसका राजनीतिक और संगठनात्मक केंद्र एक सीमित दायरे में सिमटा हुआ है?

सपा विधायक के घर पर सपाइयों का हमला

सबसे पहले अमेठी की घटना की बात करते हैं. अमेठी में सपा की महिला विधायक महाराजी देवी प्रजापति के घर पर हमला, मारपीट, गाली-गलौज और धमकी का मामला सामने आया. सबसे अहम बात यह रही कि आरोप सपा से जुड़े स्थानीय नेताओं पर लगे. FIR में जिन नामों की चर्चा हुई, उनमें ज्यादातर यादव नेता हैं. एक नाम जय सिंह यादव तो अखिलेश यादव की फैमिली का करीबी भी बताया जा रहा है. इस घटना ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों, खासकर प्रजापति समाज के भीतर नाराजगी को तेज कर दिया है. सोशल मीडिया पर खुलकर सवाल उठे कि क्या PDA में गैर-यादव पिछड़ों की भूमिका सिर्फ वोट बैंक तक सीमित है?

सपा मुख्यालय में महिला कार्यकर्ताओं से अभद्रता

दूसरी घटना लखनऊ में सपा मुख्यालय के भीतर हुई, जहां कुछ महिला कार्यकर्ता अपनी शिकायत लेकर पार्टी कार्यालय पहुंचीं थीं और अखिलेश यादव से मिलना चाहती थीं. लेकिन वहां उनके साथ धक्का-मुक्की और अभद्रता का वीडियो सामने आया. महिलाओं ने वहीं धरना देकर नाराजगी जताई. उन्होंने यहां तक कह दिया कि सपा में महिलाओं का सम्मान ही नहीं है.

मऊ में हत्या की वारदात

तीसरी घटना मऊ की है, जहां एक राजभर की गोली मारकर हत्या कर दी गई. आरोप स्थानीय यादव नेता पर लगे. इस घटना के बाद ओमप्रकाश राजभर खुलकर हमलावर हो गए. उन्होंने यहां तक कहा कि सत्ता में आने के लिए यादव जाति के लोग पागल हो गए हैं. वो गैर यादव पिछड़ी जातियों और खासकर राजभरों पर हमले कर रहे हैं.

चंदौली का भयावह वीडियो

चौथी घटना चंदौली से सामने आई, जहां सपा महिला जिलाध्यक्ष गार्गी सिंह पटेल के साथ मारपीट का मामला चर्चा में आया. आरोप यादव जाति के लोगों पर ही लगे. इस मामले को लेकर भी सोशल मीडिया पर PDA को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए कि आखिर पीडीए में यादवों से इतन अन्य जातियों का क्या महत्व है? ये हालिया घटनाएं सपा पार्टी के सामाजिक और राजनीतिक चरित्र पर सवाल खड़े कर रही हैं.

अखिलेश के तमाम प्रयोग हुए बेकार

समाजवादी पार्टी पर लंबे समय से 'यादव-मुस्लिम पार्टी' होने का आरोप लगता रहा है. इसी छवि को बदलने के लिए अखिलेश यादव ने PDA का नारा दिया. गैर-यादव पिछड़ों को जोड़ने की कोशिश हुई. पार्टी में नए सामाजिक चेहरों को आगे बढ़ाया गया. इसी रणनीति के तहत सीमा राजभर जैसी नेता को महिला राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई. श्याम लाल पाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. संदेश साफ था-समाजवादी पार्टी अब अपने पुराने सामाजिक दायरे से बाहर निकलना चाहती है. लेकिन राजनीति में सिर्फ पद देने से काम नहीं चलता, असली सवाल पावर शेयरिंग का होता है. पार्टी कल्चर का होता है और नेता के संदेश को अमल में लाने का होता है. यहीं पर अखिलेश यादव की राजनीति पर सवाल उठते हैं.

क्या अखिलेश का अड़ियल रवैया पड़ रहा भारी?

आलोचकों का कहना है कि अखिलेश पहचान तो देते हैं, पीडीए की बात तो करते हैं लेकिन वास्तविक राजनीतिक शक्ति अपने हाथ से बाहर नहीं जाने देना चाहते. पार्टी में प्रतिनिधित्व दिखाई देता है, लेकिन निर्णय लेने की असली ताकत सीमित दायरे में सिमटी रहती है. वो अलग-अलग जातियों और क्षेत्रों से आने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की बात पर अमल नहीं करते और उन्हें स्पेस नहीं देते हैं. कई विश्लेषक तो यहां तक कहते हैं कि जब कोई SP नेता विवादित बयान देता है या अनुशासनहीनता करता है तो अखिलेश यादव कड़ा एक्शन लेने से बचते हैं. जिससे ऐसे बड़बोले कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ता है. स्वामी प्रसाद मौर्य से लेकर राजकुमार भाटी तक के मामले में ये देखने को मिला है. जिन मामलों पर अखिलेश लंबे समय तक चुप्पी साधे रहे और पार्टी को खामियाजा भुगतना पड़ा.

यहीं मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की कार्यशैली का अंतर भी सामने आता है. मुलायम सिंह यादव अलग-अलग जातियों के नेताओं को सिर्फ मंच नहीं देते थे, बल्कि उन्हें राजनीतिक ताकत और संगठनात्मक नियंत्रण भी देते थे. इसी वजह से उनकी राजनीति में कई सामाजिक समूह अपने हिस्से की ताकत महसूस करते थे, जबकि अखिलेश के दौर में चेहरों का विस्तार तो दिखता है लेकिन सत्ता संरचना को लेकर सवाल बने रहते हैं. शायद यही वजह है कि ओमप्रकाश राजभर जैसे नेता बार-बार तंज कसते हैं कि अखिलेश के PDA का मतलब 'पहला दावा अहिर'है.

(लेखक डॉ. निधीश कुमार सिंह फर्रुखाबाद के भारतीय महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. वह राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं)

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