Opinion: कौन उठा रहा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गविष्ठि यात्रा का पूरा खर्च? फंडिंग नेटवर्क पर उठने लगे सवाल
राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कुछ स्थानीय नेता अविमुक्तेश्वरानंद के मंच को भविष्य के 'संपर्क क्षेत्र' के रूप में देख रहे हैं.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की 81 दिन की गविष्ठि यात्रा फिलहाल प्रतापगढ़ में है. (PTI)
कविता उपाध्याय: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की 81 दिन की गविष्ठि यात्रा अब अपने 20वें दिन में पहुंच चुकी है. ये यात्रा पूर्वांचल से अवध तक करीब 100 विधानसभा क्षेत्रों को कवर कर चुकी है और फिलहाल प्रतापगढ़ में है. जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसके पीछे काम कर रहे पूरे फंडिंग और ऑपरेशनल इकोसिस्टम को लेकर सवाल भी गहराते जा रहे हैं. आखिर इतनी लंबी यात्रा, सैकड़ों सभाएं, दर्जनों वाहनों का काफिला, मंच, प्रचार सामग्री, सोशल मीडिया टीम, डिजिटल कैंपेन, स्थानीय समन्वय, भोजन, प्रवास और भीड़ प्रबंधन का खर्च कौन उठा रहा है?
धार्मिक यात्रा या फुल-स्केल कैंपेन?
गविष्ठि यात्रा अब पारंपरिक धार्मिक यात्राओं जैसी नहीं दिखाई देती. इसका स्वरूप एक सुनियोजित अभियान की तरह नजर आने लगा है. यात्रा जहां-जहां पहुंचती है, वहां बड़े स्वागत द्वार, मंचीय आयोजन, लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग, सोशल मीडिया रील्स, भाषणों की क्लिपिंग, लाइव कवरेज और डिजिटल विस्तार योजना पहले से तैयार दिखाई देता है. इससे यह धारणा बन रही है कि इस पूरी यात्रा के पीछे एक व्यवस्थित ऑपरेशनल बैकबोन काम कर रहा है. सवाल यही है कि वह 'बैकबोन' आखिर है कौन?
जिलों में कौन संभाल रहा पूरा नेटवर्क?
राजनीतिक जानकारों की नजर सबसे ज्यादा उस नेटवर्क पर है, जो इस यात्रा में स्थानीय स्तर पर सक्रिय दिखाई दे रहा है. गोरखपुर से लेकर प्रतापगढ़ तक यात्रा के कई चरणों में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से जुड़े जिला स्तरीय नेता, पूर्व प्रत्याशी और दूसरी-तीसरी पंक्ति के स्थानीय चेहरे लगातार अविमुक्तेश्वरानंद के मंच पर दिखाई दिए. कई जगह यही लोग स्वागत, सभा आयोजन, मंच प्रबंधन और भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी संभालते नजर आए.
अमेठी में व्यापार मंडल अध्यक्ष हरिशंकर जायसवाल और सपा महिला जिला अध्यक्ष गुंजन सिंह द्वारा स्वागत किए जाने की तस्वीरें चर्चा में रहीं. इससे पहले गाजीपुर, मऊ, बलिया और देवरिया जैसे जिलों में भी स्थानीय विपक्षी नेटवर्क की सक्रियता लगातार सामने आती रही.
बड़े नेता दूर, छोटे नेता इतने करीब क्यों?
यहीं से सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल जन्म लेता है. आखिर विपक्ष के बड़े चेहरे दूरी बनाए हुए हैं, लेकिन जिला स्तर के नेता अविमुक्तेश्वरानंद के मंच से इतनी नजदीकी क्यों बढ़ा रहे हैं? क्या यह केवल धार्मिक श्रद्धा है या इसके पीछे भविष्य की कोई राजनीतिक गणित भी काम कर रही है?
राजनीतिक हलकों में अब यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कुछ स्थानीय नेता अविमुक्तेश्वरानंद के मंच को भविष्य के 'संपर्क क्षेत्र' के रूप में देख रहे हैं. खासतौर पर वे चेहरे, जिन्हें अपनी पार्टी में टिकट मिलने को लेकर हमेशा अनिश्चितता रहती है.
बिहार मॉडल ने क्यों बढ़ाई चिंता?
इन चर्चाओं को बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का अनुभव और ज्यादा हवा देता है. बिहार में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने तथाकथित 'गौ-भक्त उम्मीदवार' मॉडल के तहत करीब 198 निर्दलीय प्रत्याशियों को समर्थन दिया था. हालांकि, कोई सीट नहीं जीती और लगभग सभी की जमानत जब्त हो गई. कुल मिलाकर 5-6 लाख वोट जरूर मिले.
राजनीति के जानकार मानते हैं कि यही वह बिंदु है, जिसने उत्तर प्रदेश में नई आशंकाओं को जन्म दिया है. क्योंकि, यूपी में अब अविमुक्तेश्वरानंद 403 विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भविष्य में 'गोरक्षा' और 'सनातन' के नाम पर ऐसे उम्मीदवार खड़े किए जा सकते हैं, जो चुनाव न जीतें, लेकिन भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा दें?
सोशल मीडिया पर कौन चला रहा नैरेटिव?
यात्रा का डिजिटल इकोसिस्टम भी अब सवालों के घेरे में आने लगा है. अविमुक्तेश्वरानंद के भाषणों के छोटे-छोटे क्लिप, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अप्रत्यक्ष हमले, 'सच्चा सनातनी कौन' जैसे बयान और मंचीय वीडियो लगातार सोशल मीडिया पर वायरल किए जा रहे हैं.
दिलचस्प बात यह है कि इन्हें एम्प्लिफाई करने वालों में कई ऐसे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और पेज भी शामिल बताए जा रहे हैं, जो लंबे समय से मोदी-योगी विरोधी नैरेटिव चलाते रहे हैं. इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या यह केवल धार्मिक यात्रा का डिजिटल प्रचार है, या फिर इसके पीछे कोई बड़ा को-ऑर्डिनेटेड ईकोसिस्टम काम कर रहा है?
पारदर्शिता से परहेज क्यों?
इन सबके बीच सबसे अहम सवाल पारदर्शिता का है. अगर गविष्ठि यात्रा पूरी तरह धार्मिक और जनसहयोग आधारित अभियान है, तो फिर उसके फंडिंग मॉडल को सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों है? क्या यात्रा का कोई आधिकारिक आर्थिक विवरण जारी हुआ है? क्या दानदाताओं की सूची सार्वजनिक है? क्या जिला स्तर पर आयोजनों का खर्च रिकॉर्ड किया जा रहा है? क्या सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार के लिए अलग टीम और संसाधन काम कर रहे हैं?
आखिर मकसद क्या है?
ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अब केवल धार्मिक सीमाओं के भीतर नहीं दिखते. उनके भाषणों में लगातार राजनीतिक संकेत, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर अप्रत्यक्ष हमले और विधानसभा-वार यात्रा का फोकस यह संकेत दे रहा है कि यह केवल आध्यात्मिक यात्रा नहीं रह गई है. ऐसे में जनता और राजनीतिक समाज दोनों यह जानना चाहते हैं कि आखिर इस पूरी कवायद के पीछे केवल गोरक्षा है या कोई बड़ा सामाजिक-राजनीतिक नेटवर्क तैयार किया जा रहा है.
(डिस्क्लेमर: लेखिका कविता उपाध्याय पिछले 13 साल से जनसरोकार से जुड़ी पत्रकारिता के क्षेत्र में एक्टिव हैं. पूर्वांचल के पॉलिटिकल और हाइपर लोकल मुद्दों पर उनकी अच्छी पकड़ है. ये उनके निजी विचार हैं.)
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