Opinion: योगी आदित्यनाथ के विरोध में अब अविमुक्तेश्वरानंद को कश्मीर के मुसलमानों में भी दिखने लगे हैं गोरक्षक?

Written By: India.com Hindi News Desk Updated by: Parinay Kumar
Updated Date:June 6, 2026 6:03 PM IST

अविमुक्तेश्वरानंद बार-बार योगी सरकार को निशाने पर लेते हैं और दूसरी तरफ मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों की सराहना करते हैं, तो राजनीतिक जानकारों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है.

डॉ. सुनील कुमार मिश्र| स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की गविष्ठि यात्रा को एक महीने से अधिक समय हो चुका है. यात्रा के दौरान अविमुक्तेश्वरानंद लगातार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हमलावर हैं, जबकि दूसरी तरफ मुस्लिम प्रतिनिधिमंडलों और मुस्लिम समाज के कुछ वर्गों की खुलकर सराहना कर रहे हैं. मैनपुरी में दिया गया उनका ताजा बयान इसी वजह से चर्चा के केंद्र में आ गया है. मैनपुरी में अविमुक्तेश्वरानंद ने दावा किया कि कश्मीर के एक बुजुर्ग मुस्लिम ने उनसे मुलाकात कर रणबीर दंड संहिता को दोबारा लागू करवाने की गुहार लगाई थी. उनके अनुसार, जम्मू-कश्मीर में पहले ऐसा कानून था जिसमें गोहत्या पर कठोर सजा का प्रावधान था. उन्होंने कहा कि धारा 370 हटने के बाद वह व्यवस्था समाप्त हो गई और अब कश्मीर में गाय की रक्षा कमजोर हो गई है. अविमुक्तेश्वरानंद ने यह भी कहा कि आज देश का मुसलमान गाय की रक्षा की बात कर रहा है, लेकिन कुछ हिन्दू नेता वह बात नहीं कह पा रहे हैं.

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अविमुक्तेश्वरानंद का योगी सरकार पर निशाना

यहीं से पूरी बहस शुरू होती है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में गोवंश संरक्षण को लेकर सबसे सख्त कानूनों में से एक लागू है. योगी आदित्यनाथ वर्षों से गोरक्षा और गौसेवा को अपनी राजनीति और सार्वजनिक जीवन का महत्वपूर्ण विषय बताते रहे हैं. ऐसे में जब अविमुक्तेश्वरानंद बार-बार योगी सरकार को निशाने पर लेते हैं और दूसरी तरफ मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों की सराहना करते हैं, तो राजनीतिक जानकारों के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है. मैनपुरी में मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल ने उनसे मुलाकात कर गौमाता को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग रखी. इस प्रतिनिधिमंडल में कई स्थानीय मुस्लिम चेहरे शामिल थे. अविमुक्तेश्वरानंद ने मंच से उनकी प्रशंसा करते हुए कहा कि वे वह बात कह रहे हैं, जिसे कुछ हिन्दू नेता भी नहीं कह पा रहे. उन्होंने यहां तक कहा कि हिन्दुत्व की असली कसौटी केवल भगवा वस्त्र नहीं, बल्कि गाय को माता मानने की भावना है.

यह पहला मौका नहीं है जब यात्रा में मुस्लिम भागीदारी चर्चा का विषय बनी हो. इससे पहले फतेहपुर, कन्नौज और अन्य जिलों में भी मुस्लिम नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी को लेकर सवाल उठे थे. कई स्थानों पर मुस्लिम प्रतिनिधियों ने गोरक्षा और राष्ट्रमाता अभियान का समर्थन भी जताया. अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर अचानक यह निकटता क्यों दिखाई दे रही है? क्या यह केवल सामाजिक सद्भाव का मामला है या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक संदेश भी छिपा है?

डिंपल यादव ने भी अविमुक्तेश्वरानंद से की मुलाकात

मामला यहीं खत्म नहीं होता. अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा में समाजवादी पार्टी के शीर्ष नेताओं की सक्रियता भी चर्चा में रही. सपा सांसद डिम्पल यादव ने मैनपुरी और फिर इटावा में अविमुक्तेश्वरानंद से मुलाकात की. इटावा में ही शिवपाल सिंह यादव भी उनसे मिले हैं. यात्रा के कई पड़ावों पर सपा से जुड़े नेताओं की मौजूदगी लगातार दिखाई दी है. यही कारण है कि राजनीतिक हलकों में यह चर्चा बढ़ रही है कि क्या विपक्षी दल इस यात्रा को भाजपा के वैचारिक प्रभाव के मुकाबले एक वैकल्पिक मंच के रूप में देख रहे हैं.

कश्मीर के प्रसंग ने इस बहस को और तेज कर दिया है. धारा 370 हटाना भाजपा और नरेंद्र मोदी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में गिना जाता है. ऐसे में जब अविमुक्तेश्वरानंद उसी संदर्भ में रणबीर दंड संहिता का उदाहरण देते हैं और बताते हैं कि कश्मीरी मुसलमान उस पुराने कानून को वापस चाहते हैं, तो आलोचक पूछ रहे हैं कि क्या यह केवल गोरक्षा का मुद्दा है या फिर धारा 370 के बाद बने नए राजनीतिक ढांचे पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी भी है?

गविष्ठि यात्रा के समर्थक इसे गौमाता के सम्मान और संरक्षण का आंदोलन बताते हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यात्रा के मंचों से जितनी चर्चा गोशालाओं, किसानों और गोसंरक्षण के व्यावहारिक उपायों की नहीं हुई, उससे कहीं ज्यादा चर्चा योगी सरकार, हिन्दुत्व की प्रामाणिकता, मुस्लिम प्रतिनिधिमंडलों और राजनीतिक संदेशों की हुई है. यही वजह है कि अब यह सवाल पहले से कहीं ज्यादा जोर से पूछा जा रहा है कि आखिर इस यात्रा का वास्तविक केंद्र क्या है? क्या यह केवल गौमाता को राष्ट्रमाता बनाने का अभियान है या फिर इसके जरिए उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में एक नया वैचारिक और राजनीतिक समीकरण खड़ा करने की कोशिश भी चल रही है? मैनपुरी और इटावा के घटनाक्रम ने इस बहस को और गहरा कर दिया है.

(लेखक डॉ. सुनील कुमार मिश्र अतर्रा पीजी कॉलेज बांदा में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और समसामयिक मुद्दों पर निरंतर लेखन करते हैं.)

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