नई दिल्ली. आगामी लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा विरोधी पार्टियों के बीच महागठबंधन बनने की चर्चाएं भले सियासी गलियारों में तैर रही हों, लेकिन बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच की कड़वाहट खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. बीते दिनों तीन राज्यों में कांग्रेस मुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में इन दोनों दलों के शामिल न होने की खबर हो या द्रमुक अध्यक्ष एमके स्टालिन द्वारा राहुल गांधी को पीएम पद का प्रत्याशी बनाने के प्रस्ताव की बात, समाजवादी पार्टी और बसपा दोनों ने ही इन खबरों को तरजीह नहीं दी. यही वजह है कि अगले साल यानी 15 जनवरी को उत्तर प्रदेश में जब बसपा सुप्रीमो मायावती अपना 63वां जन्मदिन मनाएंगी, उसमें देश के विभिन्न राज्यों की कई क्षेत्रीय पार्टियों को तो बुलाया गया है, लेकिन बसपा के मेहमानों की लिस्ट में कांग्रेस का नाम नहीं है. मायावती अपने जन्मदिन के बहाने एक बार फिर विपक्षी एकता का शक्ति प्रदर्शन करने वाली हैं. इस मौके पर बसपा के चुनावी अभियान की भी शुरुआत होगी, लेकिन कांग्रेस को इस आयोजन में भी झटका ही लगने वाला है. Also Read - सुनवाई में 61 बार गैरमौजूद रहे हार्दिक पटेल नहीं जा सकेंगे गुजरात से बाहर, कोर्ट ने खारिज की अर्जी

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क्षेत्रीय दलों को आमंत्रण, कांग्रेस से दूरी

हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के मुताबिक, बसपा प्रमुख के जन्मदिन के अवसर को लेकर ढेर सारी पार्टियों को न्योता दिया गया है. नाम न छापने की शर्त पर बसपा के वरिष्ठ नेता ने अखबार को बताया कि समाजवादी पार्टी, इंडियन नेशनल लोकदल, जेडीएस, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ और कई अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं को इस समारोह के लिए आमंत्रित किया गया है. खुद बहनजी भी इन दिनों दिल्ली में रहकर गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस गठबंधन को मूर्त रूप देने की योजना पर गंभीरता से काम कर रही हैं. बसपा की योजना है कि आगामी लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस विरोधी दलों को मिलाकर एक गठबंधन बनाया जाए, और इसी के बैनर तले सभी क्षेत्रीय दल चुनाव लड़ें. बसपा नेता ने कहा भी कि मुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में न जाने से मायावती ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि भले ही एमपी और राजस्थान में पार्टी ने कांग्रेस का समर्थन किया हो, लेकिन वह लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करना चाहती हैं.

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विधानसभा चुनाव परिणामों से दूर हुए दोनों दल

बसपा सुप्रीमो मायावती और कांग्रेस के बीच बनी सियासी दूरी को बढ़ाने में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव की महत्वपूर्ण भूमिका है. इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की तरफ से बसपा के साथ गठबंधन की खबरों के चर्चा में आने के बाद एकबारगी लगा था कि यूपी के अलावा भी दोनों दल साथ आ सकते हैं. लेकिन अंत-अंत तक बसपा की ज्यादा सीटों की मांग ने गठबंधन नहीं होने दिया. दरअसल, कांग्रेस के साथ खुलकर न आने के पीछे मायावती के अपने सियासी कारण भी हैं. हाल ही में अपने एक भाषण में मायावती ने कहा था कि भाजपा-कांग्रेस की नीतियां और विचारधारा, वंचितों के खिलाफ हैं. ऐसे में वह कर्नाटक की तर्ज पर एमपी और छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय दलों से गठबंधन कर अपेक्षित सीटें जीतकर ‘किंगमेकर’ की भूमिका में आना चाहती थीं. लेकिन चुनाव के परिणामों ने बसपा के हिस्से में निराशा भर दी और दोनों दलों के बीच की दूरी और बढ़ गई. इसके बाद उत्तर प्रदेश, जो कि बसपा का गढ़ है, वहां पर मायावती अगर कांग्रेस को दरकिनार करना चाहती हैं, तो वह उनकी चुनावी रणनीति का ही हिस्सा है.

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जन्मदिन समारोह से चुनावी अभियान का आगाज

15 जनवरी को होने वाले मायावती के जन्मदिन समारोह के लिए बसपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं को दिशा-निर्देश दे दिए गए हैं. पार्टी ने इसकी तैयारी शुरू भी कर दी है. हिन्दुस्तान टाइम्स से बातचीत में पार्टी के एक नेता ने बताया, ‘बहनजी जनवरी के पहले हफ्ते में लखनऊ आएंगी और यहां पर पार्टी नेताओं व पदाधिकारियों के साथ बैठक करेंगी. इस बैठक में वह लोकसभा चुनाव की तैयारियों का जायजा लेंगी. इसी बैठक में वह संगठन को दुरुस्त करने, राज्य सरकार की जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ आंदोलन चलाने और लोकसभा चुनाव के लिए अभियान शुरू करने का निर्देश दे सकती हैं.’ बसपा नेता ने बताया कि पार्टी की इस अहम बैठक में जिलास्तर के कार्यकर्ताओं को जमीनी स्तर पर तैयारी करने का निर्देश दिया जा सकता है. साथ ही बसपा के कोर वोट-बैंक पर प्रभाव डाल रही भीम आर्मी को रोकने के संबंध में भी योजना बनाई जाएगी. बसपा के प्रदेश अध्यक्ष आरएस कुशवाहा ने बताया कि बूथ लेवेल कमेटी, भाईचारा कमेटी और पार्टी कैडरों को सक्रिय रहने का निर्देश दे दिया गया है.