नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश के फूलपुर लोकसभा सीट का उपचुनाव आगामी 11 मार्च को होना है, जिसके नतीजे 14 मार्च को आएंगे. यहां से उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या सांसद रहे हैं. उनके प्रदेश सरकार में मंत्री पद लेने के कारण ही यह लोकसभा सीट खाली हुई है. इस लोकसभा सीट का इतिहास गौरवशाली रहा है, क्योंकि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू यहां से लगातार तीन बार सांसद रहे. पं. नेहरू वर्ष 1952, 1957 और 1962 में यहां से चुनाव लड़कर सांसद बने थे. उनके सांसद बनने के कारण ही इस सीट को वीआईपी सीट का दर्जा प्राप्त है. लेकिन बाद के वर्षों में इस सीट पर अन्य पार्टियों का कब्जा रहा. इसी क्रम में बाहुबली की छवि बाले समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार अतीक अहमद यहां से 2004 में चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे. आइए जानते हैं फूलपुर के राजनीतिक इतिहास की कुछ रोचक बातें.Also Read - Parliament Winter Session: विपक्षी नेताओं ने की मुलाकात, वेंकैया नायडू की दो टूक-सांसदों को माफी मांगनी ही होगी

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1. लगातार दो बार सांसद रहते हुए जवाहर लाल नेहरू को इस संसदीय क्षेत्र में विरोध का सामना नहीं करना पड़ा था. लेकिन 1962 के आम चुनाव में प्रखर समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने पं. नेहरू के विरोध में फूलपुर से चुना लड़ा था. डॉ. लोहिया जानते थे कि वे चुनाव हार जाएंगे, फिर भी वे पं. नेहरू के विरोध में चुनाव मैदान में उतरे. नतीजा सब जानते थे, डॉ. लोहिया को पराजय का सामना करना पड़ा. Also Read - Punjab Polls: पूर्व सीएम अमरिंदर सिंह ने पंजाब में नई सरकार बनाने का बताया फॉर्मूला, BJP से गठबंधन पर कही यह बात

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2. लोकसभा चुनाव में हारने के बावजूद पं. नेहरू ने डॉ. लोहिया को राज्यसभा का सदस्य बनवाया था. क्योंकि खुद अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान रहे पं. नेहरू का मानना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में डॉ. लोहिया जैसे आलोचकों का भारतीय संसद में रहना जरूरी है. सदन में कई बार सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना करने वाले डॉ. लोहिया को भारत में समाजवादी नेताओं के शिखर पुरुषों में गिना जाता है.

3. वर्ष 1964 में पं. नेहरू के निधन के बाद उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित फूलपुर से सांसद चुनी गईं. उन्होंने 1967 के चुनाव में ‘छोटे लोहिया’ कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र को इस सीट से हराया था. लेकिन बाद में संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि बनने के बाद विजय लक्ष्मी पंडित ने यहां के सांसद पद से इस्तीफा दे दिया.

4. विजय लक्ष्मी पंडित के बाद ‘छोटे लोहिया’ जनेश्वर मिश्र फूलपुर से सांसद बने. उन्होंने पं. नेहरू के सहयोगी रहे केशवदेव मालवीय को लोकसभा सीट के उपचुनाव में मात दी थी. वे उस समय संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरे थे. इसके बाद 1971 के चुनाव में एक बार फिर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने चुनाव जीतकर यहां कांग्रेस का परचम लहराया था.

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5. 1977 के आम चुनाव से पहले देश में आपातकाल लग चुका था. लिहाजा एक बार फिर यह सीट कांग्रेस के हाथों से निकल गई. उस चुनाव में कांग्रेस ने रामपूजन पटेल को प्रत्याशी बनाया था, लेकिन जनता पार्टी की कमला बहुगुणा ने यहां से जीत हासिल कर ली. बाद के दिनों में कमला बहुगुणा कांग्रेस में शामिल हो गई थीं.

6. आपातकाल के बाद बनी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी. फलस्वरूप 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए और लोकदल के प्रो. बी. डी. सिंह यहां से सांसद बने. इसके बाद 1984 में हुए चुनावों में कांग्रेस के रामपूजन पटेल ने यहां से जीत दर्ज की. इसके बाद से अगले तीन लोकसभा चुनावों 1989 और 1991 में पटेल ही यहां के सांसद रहे.

7. पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद कांग्रेस नेता रामपूजन पटेल ही फूलपुर सीट से लगातार तीन बार सांसद रहे हैं. उनके अलावा और किसी कांग्रेसी या अन्य किसी पार्टी के नेता को इस लोकसभा क्षेत्र से तीन बार सांसद होने का अवसर नहीं मिल पाया है.

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8. 1996 से लेकर 2004 तक फूलपुर लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी का वर्चस्व रहा. इसी पार्टी के उम्मीदवार तीनों बार यहां से सांसद चुने जाते रहे. इसी क्रम में 2004 के लोकसभा चुनाव में बाहुबली की छवि वाले समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी अतीक अहमद ने फूलपुर सीट से चुनाव जीता था.

9. बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम भी फूलपुर से चुनाव लड़ चुके हैं. हालांकि उन्हें इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा था. वर्ष 2009 में यहां से चुनाव जीतकर बसपा ने इतिहास बनाया. स्थानीय जानकार बताते हैं कि इस सीट पर ‘मंडल  आंदोलन’ का असर पड़ा था, लेकिन ‘कमंडल’ का असर नहीं दिखा. इसलिए भाजपा अपनी स्थापना के 25 साल बाद तक यहां चुनाव नहीं जीत सकी.

10. 1990 से शुरू हुई ‘राम लहर’ के बावजूद फूलपुर लोकसभा सीट पर कभी भी भारतीय जनता पार्टी का कोई उम्मीदवार चुनाव नहीं जीता. इसीलिए जब 2014 के आम चुनाव हुए और भाजपा के केशव प्रसाद मौर्या ने इस सीट से जीत दर्ज की, तो यह भाजपा के लिए ऐतिहासिक था. इसी जीत के परिणामस्वरूप मौर्या को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया.