लखनऊ: यूपी में गोरखपुर-फूलपुर के बाद कैराना लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी की हार से गठबंधक दलों की बांछे खिल गई हैं. वैसे तो कैराना में बीजेपी का सीधा मुकाबला राष्ट्रीय लोकदल से था, लेकिन उसके पीछे सपा, बसपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और कई छोटे दलों का समर्थन बीजेपी की हार का सबसे बड़ा कारण बना है. इसके अलावा बीजेपी गोरखपुर-फूलपुर के बाद कैराना में भी विपक्षी गठबंधन की काट खोजने में नाकाम रही है. वहीं कैराना की जीत आरएलडी के लिए संजीवनी मिलने जैसी है. क्‍योंकि इस इलाके के जाट और मुस्लिम वोटों को एकजुट करके ही आरएलडी सुप्रीमो अजित सिंह ने कई बार सत्ता का स्वाद चखा, लेकिन पिछले काफी समय से यह गठजोड़ संभव नहीं हो पाया था. Also Read - राजस्थान सरकार पर मायावती का निशाना, कहा किराया मांगना कंगाली और अमानवीयता का प्रदर्शन

Also Read - IRCTC Indian Railway Trains List For Delhi: दिल्ली से चलेंगी 40 ट्रेनें, जानें हर स्टेशन से ट्रेनों के चलने और गुजरने की जानकारी

कैराना लोकसभा उपचुनाव में आरएलडी सांसद तबस्सुम हसन को सपा, बसपा और कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी, भीम आर्मी और कई अन्य छोटे दलों का भी समर्थन मिला. क्‍योंकि आरएलडी ने पश्चिमी यूपी में दोबारा राजनीतिक दबदबा बनाने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया था. बता दें कि 2014 के आम चुनाव के साथ 2017 के विधानसभा चुनाव में भी आरएलडी को क़रारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था. 2017 में आरएलडी का एकमात्र विधायक जीता था, जो कि बाद में भाजपा में शामिल हो गया था. Also Read - नोएडा बॉर्डर पर 100 बसों के साथ पहुंचे कांग्रेसी नेता, लॉकडाउन का उल्लंघन करने को लेकर FIR दर्ज

कैराना उपचुनाव: रुझानों में मिली बढ़त पर तबस्सुम बोलीं-यह सत्‍य की जीत, 2019 में ईवीएम से न हो चुनाव

लोकदल को मिली संजीवनी

कैराना लोकसभा उपचुनाव आरएलडी यानी राष्ट्रीय लोकदल के लिए वजूद की लड़ाई सरीखा रहा. बता दें कि कुछ साल पहले तक पश्चिमी यूपी पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह के नेतृत्व वाली आरएलडी का गढ़ हुआ करती थी. इस इलाके के जाट और मुस्लिम वोटों को एकजुट करके अजित सिंह ने कई बार सत्ता का स्वाद चखा है लेकिन पिछले काफी समय से यह गठजोड़ संभव नहीं हो पा रहा था. लेकिन इस चुनाव में मिली जीत से पार्टी को संजीवनी मिल गई है.

RLD प्रत्याशी तबस्सुम के पति-ससुर रह चुके हैं MP, बेटा है MLA… ऐसे ही नहीं कैराना से मैदान में

मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद जाट-मुस्लिम गठजोड़ में सफल रही आरएलडी

नवंबर 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद पश्चिमी यूपी में जाट और मुस्लिम समुदाय के बीच तनाव बरक़रार रहा. ऐसे में आरएलडी के सामने यह एक बड़ी चुनौती बन गई थी. लेकिन अब विपक्षी एकता बनने के बाद से अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी जाट और मुस्लिम गठजोड़ को एक बार फिर से कायम करने में सफल रहे. क्‍योंकि पिछले छह महीनों में आरएलडी सुप्रीमो और उनके बेटे जयंत चौधरी ने सौ से ज्‍यादा रैलियां कीं. इस दौरान उन्‍होंने दोनों समुदाय के लोगों को एकजुट होने का संदेश देकर पार्टी के लिए वोट मांगे. साथ ही साथ आरएलडी ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के नाम पर इमोशनल कार्ड भी खेला, क्‍योंकि उनकी पुण्यतिथि चुनाव के एक दिन बाद थी.