सहारनपुर (यूपी): सहारनपुर स्थित इस्लामिक शिक्षण संस्थान दारुल उलूम देवबंद ने हलाला प्रथा को लेकर फतवा जारी किया है. फतवे में दारुल उलूम देवबंद ने हलाला को इस्लाम में नापंसद और नाजायज बताया है. दारुल उलूम देवबंद ने एक सवाल के जवाब में ये जवाब के रूप में ये फतवा जारी किया है. दारुल उलूम के फतवा विभाग में मुफ्तियों की खंडपीठ से लिखित में हलाला को लेकर सवाल पूछा था. इसके जवाब में मुफ्तियों ने कहा कि तलाक के बाद औरत को ये हक मिल जाता है कि वह तलाक देने वाले मर्द के अलावा जिस किसी भी मर्द से चाहे निकाह कर सकती है.

बावजूद इसके कुछ लोग हलाला के नाम पर बैठकर यह तय कर देते हैं कि महिला दूसरे मर्द के साथ केवल हलाला करेगी और फिर से अपने पुराने शौहर के साथ निकाह करेगी तो यह गलत है. ये सरासर नाजायज है. देवबन्दी उलेमा मुफ्ती असद कासमी ने कहा कि हलाला जैसी कोई प्रथा इस्लाम में नहीं है. ये इस्लाम नापसंद है. इसे इस्लाम में ‘लानत’ माना गया है. औरत को तलाक के बाद पूरा हक को जाता है कि वह अपनी मर्जी से कहीं भी शादी करे. उस पर किसी भी तरह का दबाव नहीं डाला जा सकता है.

उन्होंने यह भी बताया कि इस्लाम में औरत खुदमुखतार (आजाद) है. मुफ्ती असद कासमी ने बताया कि पहले शौहर से दोबारा निकाह करने के लिए दूसरे शौहर से जबरदस्ती तलाक कराना जायज नहीं है, लेकिन अगर दूसरा शौहर खुद ही किसी वजह से बाद में उसको तलाक दे दें, तो इद्दत के बाद फिर औरत को नए निकाह का हक हो जाएगा. फतवे में कहा गया कि अब अगर चाहे तो औरत अपनी मर्जी से पहले शौहर से नया निकाह कर सकती है. यदि दूसरा निकाह करने वाले व्यक्ति की खुद यह नीयत हो कि, मैं बाद में इसे तलाक दे दूंगा ताकि ये अपने पहले शौहर से दोबारा निकाह कर इज्जत और खुशियों के साथ अपनी जिंदगी गुजारे तो इसमें कुछ हद तक गुंजाइश है.