फूलपुर लोकसभा सीट पर 1952 से अब तक तीसरी बार उप चुनाव हो रहे हैं. सबसे पहले 1964 में पंडित जवाहर लाल नेहरू के असामयिक निधन के बाद उप चुनाव हुए, जिसमें नेहरूजी की बहन विजय लक्ष्मी पंडित चुनाव जीत कर लोकसभा पहुंचीं. उसके बाद 1969 में संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधि बनने के बाद विजय लक्ष्मी पंडित ने इस लोकसभा सीट से इस्तीफा दे दिया. वापस दूसरी बार हुए उप चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी से ‘छोटे लोहिया’ कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र चुनाव जीतने में सफल हुए. पहली बार इस सीट पर गैरकांग्रेसी उम्मीदवार को चुनाव जीतने का मौका मिला. हालांकि बाद में भी दो बार यह सीट कांग्रेस जीतने में सफल रही. अब एक बार इस सीट पर लोकसभा के उप चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में जबकि भाजपा ने पहली बार 2014 में फूलपुर से जीत का स्वाद चखा था, देश की सबसे प्रतिष्ठित सीटों में से एक फूलपुर पर इस दूसरी बार कमल खिलेगा या नहीं, इस पर सबकी निगाहें रहेंगी.

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लोहिया से लेकर, कांशीराम और सोनेलाल पटेल तक हार चुके हैं फुलपुर से
फूलपुर लोकसभा सीट इसलिए जानी जाती है कि यहीं से देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू चुनकर लोकसभा पहुंचे थे. उन्होंने लगातार तीन चुनावों में इस सीट का प्रतिनिधित्व किया. लेकिन इस सीट पर कई राष्ट्रीय नेताओं को हार का भी सामना करना पड़ा है. देश में समाजवाद का नारा बुलंद करने वाले और मुलायम सिंह यादव के गुरु राममनोहर लोहिया को 1962 के आम चुनाव में नेहरू के सामने हार का सामना करना पड़ा था. हेमवती नंदन बहुगुणा की पत्नी व योगी सरकार में वर्मतान में मंत्री रीता बहुगुणा जोशी की मां कमला बहुगुणा को भी इस सीट पर पराजय मिली है. इसके अलावा 1996 में हुए लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कांशीराम और अपना दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनेलाल पटेल को भी इस सीट पर हार का सामना करना पड़ा है. हारने के बाद इन नेताओं ने दोबारा इस सीट पर कभी चुनाव नहीं लड़ा.

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सबसे ज्यादा सात बार कांग्रेस के चुने गए हैं सांसद
फूलपुर लोकसभा सीट पर अब तक हुए चुनाव में सबसे ज्यादा सात बार कांग्रेस पार्टी को जीत मिली है, जिसमें तीन बार पंडित नेहरू चुनाव जीते थे. इसके बाद 1996 से 2004 तक चार बार समाजवादी पार्टी को जीत मिली. 1989 और 1991 में जनता दल को जीत मिली. इसके अलावा सभी पार्टियों को एक-एक बार सफलता मिली है, जिसमें भाजपा, बसपा, सोशलिस्ट, जेएनपी और बीएलडी शामिल हैं.

यह आलेख वीरेंद्र कुमार राय ने लिखा है. लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)