नई दिल्लीः उत्तर प्रदेश की दोनों अहम लोकसभा सीटों गोरखपुर और फूलपुर में उपचुनाव में भाजपा की हार की मुख्य वजह सपा-बसपा के बीच गठजोड़ नहीं है. सूबे के सीएम योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के फूलपुर में कई ऐसे कारण रहे जिसपर भाजपा ने ध्यान नहीं दिया. जानकारों का कहना है कि दोनों सीटों पर पूर्व के चुनावों का विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि भाजपा ने खुद अपना प्रदर्शन खराब किया है. इन दोनों सीटों पर हुए मतदान के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह स्थिति और साफ हो जाती है.Also Read - सपा के शासन में जाली टोपी वाले गुंडे व्यापारियों को धमकाते थे, UP Dy CM केशव मौर्य

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गोरखपुर में बढ़त कायम नहीं रख पाई भाजपा Also Read - Farm Law Repeal: साक्षी महाराज-कलराज मिश्र के बयान बढ़ा सकते हैं किसानों की टेंशन, क्या कहा है..देखें Video

भाजपा से बढ़कर सीएम योगी का गढ़ माने जाने वाले गोरखपुर में वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से लगातार भाजपा की स्थिति खराब हुई है. 2014 में योगी को 51.8 फीसदी वोट मिले थे, जबकि उस चुनाव में सपा और बसपा ने अपना-अपना उम्मीदवार उतारा था. दोनों का कुल मत प्रतिशत 38.7 फीसदी था. उस हिसाब से देखें तो इस बार सपा-बसपा के बीच गठजोड़ से भाजपा को बिल्कुल चिंतित होने की जरूरत नहीं थी, क्योंकि वह मत प्रतिशत में दोनों दलों के मुकाबले 14 फीसदी से अधिक मतों से आगे थी.

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विधानसभा चुनाव में दरक गया था भाजपा का वोट बैंक

2014 के लोकसभा चुनाव में मिले जनसमर्थन को भाजपा 2017 के विधानसभा तक नहीं संभाल पाई. पिछले साल हुए चुनाव में पार्टी को केवल 40.2 फीसदी ही वोट मिले. यानी करीब तीन सालों के भीतर समर्थन में करीब 12 फीसदी की कमी आई. दूसरी तरफ बीते विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा का कुल मत 35.9 फीसदी था, जो इस उपचुनाव में बढ़कर 49 फीसदी पर पहुंच गया. भाजपा ने विधानसभा चुनाव की तुलना में अपने मत प्रतिशत को सुधारने में कामयाब हुई लेकिन पिछले लोकसभा की तुलना में काफी कम रहा. इस चुनाव में पार्टी को केवल 46 फीसदी वोट मिले.

फूलपुर में भी पार्टी की हाल रही बुरी

पिछले लोकसभा चुनाव में फूलपुर से भाजपा के उम्मीदवार रहे डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को 52.4 फीसदी वोट मिले थे. लेकिन पिछले साल के विधानसभा चुनाव में पार्टी इस बढ़त को कायम नहीं रख सकी और उसे केवल 35.3 फीसदी वोट मिले. हालांकि, इस उपचुनाव में भाजपा को 39 फीसदी वोट मिले. दूसरी तरफ 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा का कुल वोट 37.4 फीसदी था, जो 2017 के विधानसभा चुनाव में बढ़कर 45.9 फीसदी और उपचुनाव में बढ़कर 47 फीसदी हो गया. उस वक्त कहा जा सकता था कि अगर सपा-बसपा ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा होता तो फूलपुर में भाजपा को बुरी हार का सामना करना पड़ सकता था.

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इस बार जनता डिलिवरी चाहती थी, बहाने नहीं

दोनों सीटों पर भाजपा की स्थिति बुरी क्यों हुई? इस सवाल पर गोरखपुर को करीब से जानने वाले वरिष्ठ पत्रकार आनंद प्रकाश श्रीवास्तव ने कहा, चीजें बिल्कुल स्पष्ट हैं. यह बिल्कुल सही है कि दोनों सीटों पर सपा-बसपा के बीच गठजोड़ से विपक्षी उम्मीदवार को मजबूती मिली. भाजपा की हार में यह एक कारण हो सकता है, लेकिन मूल कारण पर कोई चर्चा नहीं कर रहा है.

उन्होंने कहा, गोरखपुर की राजनीति में गोरक्षनाथ पीठ के दबदबे के करीब तीन दशक के दौरान यह पहला मौका था जब योगी के पास कोई बहाना नहीं था. इस बार उनको गोरखपुर में बदलाव दिखाना था. अभी तक वह राज्य और केंद्र में सरकार न होने के बहाने से अपनी नैय्या पार कर ले जा रहे थे. इस बार स्थिति बिल्कुल स्पष्ट थी. उनको जनता को डिलिवर करना था, लेकिन इस मोर्चे पर राज्य की सरकार विफल रही. बिजली, सड़क, पानी जैसी आधारभूत सुविधाओं के लिए गोरखपुरवासियों की दिक्कतें बदस्तूर जारी है. इसके अलावा गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौत का गुस्सा भी उनको झेलना पड़ा.

जातीय समीकरण सबसे अहम कारण नहीं

आनंद का कहना है कि गोरखपुर में जातीय समीकरण हमेशा से एक बड़ा कारण रहा है, लेकिन योगी को करीब-करीब हर जाति का समर्थन मिलता था. पूरे देश में भाजपा की बुरी स्थिति होने के बावजूद योगी ने न केवल गोरखपुर बल्कि आसपास की सीटों पर भी भाजपा की जीत सुनिश्चित करते थे, लेकिन उस वक्त योगी जनता को यह बताने में सफल रहते थे कि उनकी सरकार नहीं है. अगर उनकी सरकार होती तो स्थिति दूसरी होती, लेकिन इस बार स्थिति बिल्कुल जनता के पक्ष में थी और जबाव योगी को देना था. शायद योगी से यहीं सबसे बड़ी चूक हुई.