नई दिल्ली. आबादी की दृष्टि से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव हो तो राजनीति में दिलचस्पी लेने वालों की नजर यहीं टिकी रहती हैं. इस बार तो मुकाबला और जोरदार है. क्योंकि गोरखपुर में उपचुनाव हो रहे हैं, जो वर्तमान में प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ का गढ़ है. पिछले 29 वर्षों से गोरखपुर के सांसद का पता, गुरु गोरखनाथ मंदिर, नहीं बदला है. लेकिन इस चुनाव में जबकि योगी आदित्यनाथ उम्मीदवार नहीं हैं, विपक्षी पार्टियों को भाजपा से यह सीट छीनने का भरोसा है. वहीं, भाजपा अपने परंपरागत सीट को किसी भी कीमत पर खोने का जोखिम नहीं ले सकती. गोरखपुर से इतर पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सीट फूलपुर में भी उपचुनाव होने हैं. यह सीट वीआईपी रही है. इस बार भी वीआईपी है, क्योंकि यहां के सांसद केशव प्रसाद मौर्या थे. वे अब इस्तीफा देकर प्रदेश के डिप्टी सीएम बन चुके हैं. जाहिर है राजनीति की बिसात पर इन दोनों सीटों के उपचुनावों के परिणाम असरकारी होंगे. इसलिए सियासी रणनीतिकार और इससे जुड़े सभी लोगों के लिए इन दोनों सीटों का चुनाव बड़ा महत्वपूर्ण बन गया है. आइए यूपी के इन दोनों सीटों की राजनीतिक स्थिति पर डालते हैं एक नजर. Also Read - सुनवाई में 61 बार गैरमौजूद रहे हार्दिक पटेल नहीं जा सकेंगे गुजरात से बाहर, कोर्ट ने खारिज की अर्जी

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गोरखपुर में भाजपा ने सीएम योगी आदित्यनाथ के प्रतिनिधि माने जा रहे उपेंद्र शुक्ल को चुनाव मैदान में खड़ा किया है. वहीं उनके खिलाफ मैकेनिकल इंजीनियरिंग कर चुके सपा के प्रवीण निषाद खड़े हैं. बीच में कांग्रेस भी है, जिसने यहां के एक लोकप्रिय सामाजिक चेहरे चिकित्सक डॉ. सुरहिता करीम को प्रत्याशी बनाया है. ऐसे में यहां की लड़ाई राजनीतिज्ञ बनाम इंजीनियर बनाम डॉक्टर के बीच हो गई है. तीनों दल अपने-अपने सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों के आधार पर अपने दावों को मजबूत बता रहे हैं. सीएम योगी आदित्यनाथ के लिए इस उपचुनाव में भाजपा की प्रभावशाली जीत सुनिश्चित कराना सबसे अहम है. क्योंकि सकारात्मक परिणाम से पार्टी में उनका कद और बढ़ेगा. लेकिन विपरीत चुनाव परिणाम से विपक्ष के लिए बयानों का मैदान खुल जाएगा. इसलिए वे चुनावी जीत के वास्ते ताबड़तोड़ जनसभाएं कर रहे हैं. वहीं, विपक्षी सपा के उम्मीदवार प्रवीण निषाद और बीते दिनों मिले बसपा के समर्थन (दलित वोट) का भरोसा है. बसपा भी राज्यसभा चुनावों की रणनीति के तहत सपा के प्रत्याशी के पक्ष में जोर-शोर से प्रचार कर रही है. इधर, पिछले चुनावों में सपा के साथ रही कांग्रेस ने अपना स्वतंत्र प्रत्याशी उतारा है. पार्टी को उम्मीद है कि उसकी प्रत्याशी डॉ. सुरहिता करीम की सामाजिक छवि की बदौलत उसे हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों के वोट मिलेंगे.

वोट समीकरण – यहां करीब साढ़े तीन लाख मुस्लिम, साढ़े चार लाख निषाद, दो लाख दलित, दो लाख यादव और डेढ़ लाख पासवान मतदाता हैं.

बसपा के साथ सपा का होगा फूलपुर-गोरखपुर या बीजेपी फिर खिलाएगी कमल ?

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फूलपुर में सियासतदानों के बीच अतीक अहमद बने फैक्टर

प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या के सांसद पद से इस्तीफा देने से खाली हुई फूलपुर लोकसभा सीट का चुनाव भी काफी दिलचस्प हो गया है. क्योंकि सपा-बसपा, कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों के बीच अचानक निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन पर्चा दाखिल कर पूर्व सांसद अतीक अहमद भी चुनाव मैदान में पहुंच गए हैं. 2004 में यहां से सांसद रहे बाहुबली छवि के अतीक अहमद अभी जेल में बंद हैं. भाजपा ने यहां वाराणसी के पूर्व मेयर कौशलेंद्र सिंह पटेल को मैदान में उतारा है. वहीं सपा की ओर से नागेंद्र सिंह पटेल और कांग्रेस की तरफ से मनीष मिश्रा चुनाव मैदान में हैं. इस सीट पर नौ निर्दलीय उम्मीदवार सहित कुल 22 प्रत्याशी मैदान में हैं. भाजपा के लिए यह सीट जीतना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 2014 में केशव प्रसाद मौर्या ने पहली बार इस सीट पर पार्टी को जीत दिलाई थी. ऐसे में पार्टी के लिए यह सीट बचाना अहम है. वहीं, सपा इस सीट पर पहले भी जीतती रही है, इसलिए केशव प्रसाद मौर्या की नाकामियों को गिनाकर किसी भी तरह से यह सीट हथियाना चाहती है. उधर, कांग्रेस के लिए यह सीट प्रतिष्ठा से जुड़ी हुई है, क्योंकि इसी सीट से पं. जवाहरलाल नेहरू ने लगातार तीन बार सांसद रहने का रिकॉर्ड बनाया था.

वोट समीकरण – यहां के 7 लाख से ज्यादा पिछड़ा वर्ग, 2.25 लाख मुस्लिम और 4.50 लाख से ज्यादा अगड़ी जाति के मतदाता हैं.