नई दिल्लीः उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा के लिए हुए उपचुनावों में विपक्षी गठबंधन से भाजपा की हार के बाद अगले साल के लोकसभा चुनाव की चर्चा तेज हो गई है. यह पहला मौका नहीं जब भाजपा को ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है. इससे पहले भी गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनाव में भाजपा को सपा और बसपा गठबंधन से हार का सामना करना पड़ा था. एक साल के भीतर यूपी के तीन महत्वपूर्ण स्थानों पर भाजपा की हार के बीच विपक्षी दलों के गठबंधन को अहम माना जाने लगा है. Also Read - ग्वालियर में लगे ज्योतिरादित्य सिंधिया के गुमशुदगी के पोस्टर्स, लिखा- 'गुमशुदा जन सेवक की तलाश...'

राजनीतिक जानकारों की मानें तो उपचुनाव के परिणामों के ये संकेत भाजपा के लिए 2019 के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में रेड-सिग्नल हैं. क्योंकि जिस तरह गोरखपुर-फूलपुर उपचुनाव के बाद सपा-बसपा को वोट मिले थे और अब गठबंधन में रालोद के आ जाने से विपक्ष का मत प्रतिशत बढ़ा है, इसके आधार पर भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव का समर जीतना आसान नहीं होगा. बता दें कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की कैराना लोकसभा सीट और नूरपुर विधानसभा सीट के लिए बीते 28 मई को उपचुनाव कराए गए थे. कैराना में राष्ट्रीय लोकदल की प्रत्याशी तबस्सुम हसन ने भाजपा की उम्मीदवार मृगांका सिंह को भारी मतों के अंतर से हरा दिया है. वहीं नूरपुर में सपा के उम्मीदवार सपा के नईमुल हसन ने भी भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ जीत दर्ज की है. Also Read - देश भर में प्रवासी मजदूरों कि इस हालत के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों ही जिम्मेदार हैं : मायावती

उत्तर प्रदेश में पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा को मिलाकर जितने वोट पड़े थे, उन्हें अगर जोड़ दिया जाए तो आने वाले चुनावों में राज्य में भाजपा को भारी नुकसान हो सकता है. दोनों दलों को मिले वोट उन्हें राज्य की 57 लोकसभा सीटों पर जीत दिला सकती है. ऐसे में भाजपा को केवल 23 सीटों से ही संतोष करना पड़ेगा. इसमें यदि रालोद जैसे पश्चिमी यूपी पर पकड़ रखने वाले दल को भी जोड़ें तो इस आंकड़े में और फेरबदल हो सकती है. गोरखपुर-फूलपुर उपचुनावों में बसपा के समर्थन से सपा उम्मीदवार की जीत और अब कैराना में रालोद उम्मीदवार की जीत के बाद अगर भाजपा विरोधी दल इसी गणित पर काम करते हैं तो निश्चित रूप से भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है. बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा और बसपा ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. उस चुनाव में भाजपा को यूपी की 80 में से 73 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. इसी तरह 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भी दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था. विपक्षी दलों के इसी बिखराव की बदौलत भाजपा को यूपी में प्रचंड बहुमत प्राप्त हुआ और योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पार्टी की सरकार बनी. लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा को मिले वोटों को मिला दिया जाए तो राज्य की सियासी तस्वीर कुछ और ही बनती है.

गठजोड़ की स्थिति में 57 सीटों पर जीत सकती है सपा-बसपा
यूपी विधानसभा चुनाव में प्रदेशभर में पड़े कुल वोट में से सपा-बसपा को प्राप्त वोट को जोड़ें तो राज्य की 80 से में 57 लोकसभा सीटों पर इन दोनों पार्टियों की बढ़त स्पष्ट होती है. बता दें कि विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा को भाजपा की तुलना में औसतन 1.45 लाख अधिक वोट मिले, जबकि भाजपा की 23 लोकसभा सीटों पर औसत बढ़त केवल 58 हजार वोटों की है. गौर करने वाली बात यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के पास 73 लोकसभा सीटों पर औसतन 1.88 लाख वोटों की बढ़त थी. 2014 में भाजपा ने जिन 73 सीटों पर जीत हासिल की थी उसमें से 55 पर उसकी जीत का अंतर एक लाख से अधिक वोटों का था. सपा-बसपा के बीच गठबंधन की स्थिति में अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को जिन 23 सीटों पर जीत दिख रही है, उनमें से केवल चार सीटों वाराणसी, गाजियाबाद, मथुरा और गौतमबुद्धनगर में ही उसकी जीत का अंतर एक लाख से अधिक वोटों का दिखता है.