Opinion: क्या बदल रहा है पूर्वांचल का सियासी मिजाज? BJP vs SP में किसके पक्ष में बन रहे समीकरण
यूपी चुनाव 2027 में पूर्वांचल की 160 विधानसभा सीटें सबसे अहम मानी जा रही हैं. जानिए BJP और SP के बदलते राजनीतिक समीकरण, गठबंधन, विकास, जातीय राजनीति के बारे में.
विपक्ष के लिए 2022 जैसी एकजुटता दोहराना आसान नहीं माना जा रहा.
भावेष पांडेय । यूपी की राजनीति में पूर्वांचल सबसे अहम क्षेत्र माना जाता है. करीब 160 विधानसभा सीटों वाला यह इलाका लंबे समय से सरकार बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है. गंगा, गोमती, राप्ती और गंडक जैसी नदियों से समृद्ध यह क्षेत्र कृषि और आबादी दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है. हालांकि, कई सालों तक यहां चुनाव जातीय समीकरणों, पलायन और पिछड़ेपन जैसे मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमते रहे, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है. 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले यह सवाल उठ रहा है कि क्या पूर्वांचल एक बार फिर सत्ता की दिशा तय करेगा. क्या इस बार वोटरों की प्राथमिकताएं पहले जैसी रहेंगी या बदल चुकी हैं.
2022 के मुकाबले 2027 में क्यों बदले समीकरण?
बता दें 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने कई छोटे दलों के साथ गठबंधन कर पूर्वांचल में मजबूत चुनौती पेश की थी. इसका फायदा भी पार्टी को कई सीटों पर मिला, लेकिन अब हालात पहले जैसे नहीं हैं. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल और अपना दल (सोनेलाल) जैसे कई दल अब एनडीए का हिस्सा हैं. वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) और उसके पुराने सहयोगियों के रिश्तों में भी पहले जैसी मजबूती नहीं दिखती. कांग्रेस के साथ 2024 लोकसभा चुनाव में तालमेल सफल रहा, लेकिन 2027 में सीट बंटवारा और नेतृत्व जैसे मुद्दे नई चुनौतियां बन सकते हैं. ऐसे में विपक्ष के लिए 2022 जैसी एकजुटता दोहराना आसान नहीं माना जा रहा.
जाति के साथ विकास भी बन गया बड़ा मुद्दा
पूर्वांचल की राजनीति अब सिर्फ जातीय समीकरणों तक सीमित नहीं रह गई है. सड़क, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, रेलवे, निवेश, कानून-व्यवस्था और धार्मिक पर्यटन जैसे मुद्दे भी चुनावी चर्चा के केंद्र में आ चुके हैं. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे, हाईवे, रेलवे आधुनिकीकरण और औद्योगिक परियोजनाओं को अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया है. वहीं युवाओं के बीच रोजगार, शिक्षा और डिजिटल सुविधाओं की मांग भी लगातार बढ़ी है. इसका मतलब यह नहीं कि जातीय राजनीति खत्म हो गई है, बल्कि अब मतदाता विकास और स्थानीय सुविधाओं को भी अपने फैसले का अहम आधार बना रहे हैं.
2027 में किसकी होगी असली परीक्षा?
आपको बता दें पूर्वांचल पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कर्मभूमि गोरखपुर का इलाका भी है. इसलिए भाजपा के लिए इसका राजनीतिक महत्व काफी ज्यादा है. दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती है कि वह विकास के मुद्दों के मुकाबले अपना भरोसेमंद विकल्प कैसे पेश करती है. साथ ही महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की आय और स्थानीय समस्याएं भी चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगी. इससे साफ है कि 2027 का चुनाव केवल जातीय गणित या विकास योजनाओं के दम पर नहीं जीता जाएगा.
(भावेष पांडेय इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता हैं. वह सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लेखन करते हैं)
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