लखनऊ: देश में बुलेट ट्रेन चलाने की कवायद चल रही है. वहीं, एक ऐसी ट्रेन है, जो यात्रियों के हाथ देने पर रुक जाती है. यदि प्लेटफार्म पर कोई यात्री दौड़ता हुआ दिखता है तो उसके लिए ट्रेन को रोक दिया जाता है. लोको पायलट जल्दी बैठने का इशारा करता है. कोई और तो नहीं आ रहा, ये देखने के लिए लोको पायलट व गार्ड स्टेशन व आसपास नज़र दौड़ाते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं. 116 साल पुरानी यह ट्रेन देश की सबसे छोटी ट्रेन है. सिर्फ तीन कोच की ये ट्रेन मात्र 13 किलोमीटर का सफर तय करती है. आज जब प्लेटफार्म टिकट भी 10 रुपये है, वहीं इस ट्रेन का टिकट सिर्फ 5 रुपए है. पिछले सप्ताह 19 अप्रैल को इस ट्रेन के एक कोच में आग लग गई. इससे अब ये दो ही कोच की रह गई है. आग के कारण एक दिन ट्रेन खड़ी रही तो बंद होने की आशंका से लोगों ने धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया. इसके बाद ट्रेन फिर से दौड़ने लगी है.

बाहर के लोग ट्रेन देखने आते हैं, रोचक होता है सफर
यूपी के जालौन जिले के कोंच-एट कस्बे के बीच यह ट्रेन चलती है. नार्थ सेंट्रल रेलवे के झांसी-कानपुर रेलमार्ग पर एट जंक्शन से कोंच रेलवे स्टेशन है. पिछले 116 सालों से चल रही तीन डिब्बों की ये ट्रेन इन दोनों स्टेशन के बीच सिर्फ 13 किलोमीटर का सफर तय करती है. सफर 35 मिनट का होता है. कोंच स्टेशन सिर्फ इसी ट्रेन के लिए बना है. इसके अलावा यहां कोई और ट्रेन नहीं पहुंचती है. लोको पायलट केके पटेरिया बताते हैं कि एकल पद्धति पर चलने देश की एकमात्र ट्रेन है. कई लोग इसे सिर्फ देखने आते हैं. ट्रेन में सफर के लिए दूरदराज गांवों से लोग घंटों पहले कोंच पहुंच जाते हैं. इसमें खाना खाते हैं. इसी में सो लेते हैं. ट्रेन में गांव-मज़रों के किसान, छात्र, नौकरीपेशा लोग व व्यापारियों सहित हर वर्ग के लोग चलते हैं. ये ट्रेन एक शताब्दी से अधिक समय से लोगों के लिए ‘लाइफ लाइन’ बनी हुई है.

ट्रेन दो कस्बों के लोगों के लिए टैक्सी की तरह है.

ट्रेन दो कस्बों के लोगों के लिए टैक्सी की तरह है.

सवारियों को लेकर ही आगे बढ़ती है यह ट्रेन
एट कस्बे के लोग कोंच कस्बे में और कोंच के लोग एट में व्यापार करते हैं. सड़क मार्ग ठीक नहीं है. सुबह इसी ट्रेन से आते हैं और शाम में इसी ट्रेन से वापस हो जाते हैं. छात्र कोचिंग या कॉलेज इसी ट्रेन से जाते हैं. एट से कोंच तक के लिए यह ट्रेन ठसाठस भर जाती है. लगभग 500 लोग इसमें सवार होते हैं. ट्रेन एट रेलवे स्टेशन से कोंच तक पांच चक्कर लगाती है.

अंग्रेज़ों ने इस कारण शुरू की थी ट्रेन, ये है इतिहास
अंग्रेजों ने इस ट्रेन की शुरुआत 1902 में की थी. माल ढोने के लिए दो व सिर्फ एक यात्री डिब्बा इसमें था. जालौन जिले का कोंच कस्बा कभी देश का मुख्य कपास उत्पादन व बिक्री का एक बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था. एट में पहले से झांसी-कानपुर को जोड़ती हुई रेल लाइन थी. इसीलिए अंग्रेजी हुकूमत ने कोच मंडी तक रेल लाइन बिछाई. अंग्रेज मंडी से कपास की गांठें, गेहूं और अन्य सामान को कलकत्ता और मुंबई भेजा करते थे. इस माल को मैनचेस्टर भेजा जाता था. यहां उम्दा किस्म का कपड़ा बनाकर ब्रिटेन व भारत के बाजारों में बेचा जाता था.

ये देश की सबसे कम दूरी पर चलने वाली सबसे छोटी ट्रेन है.

ये देश की सबसे कम दूरी पर चलने वाली सबसे छोटी ट्रेन है.

हमेशा घाटे में रहती है, बंद होने की बात पर होते हैं आंदोलन
19 अप्रैल की रात कोंच स्टेशन पर खड़ी इस ट्रेन में आग लग गई. शार्ट सर्किट इसकी वजह माना गया. ट्रेन का एक कोच पूरी तरह से जल गया. इसके बाद ट्रेन एक दिन खड़ी रही. लोगों को लगा कि ट्रेन बंद की जा सकती है. इस पर लोगों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया. इसके बाद जला हुआ एक कोच हटाकर फिर से चलाया जाने लगा. रेलवे के अनुसार, ट्रेन हमेशा घाटे में रहती है. ट्रेन के संचालन से स्टेशन मास्टर, गार्ड तक की तनख्वाह नहीं निकलती है. इस कारण ट्रेन बंद किए जाने की कोशिश हुई, लेकिन लोग सड़कों पर उतर आते हैं. लोगों का कहना है कि यही एकमात्र ट्रेन है, जो कोंच के लोगों को आधुनिक होने का अहसास दिलाती है.