लखनऊ: देश के सबसे पुराने कोयला आधारित बिजली संयंत्रों का घर कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश स्थित सोनभद्र में मरकरी (पारे) के प्रदूषण के खतरनाक स्तरों का खुलासा हुआ है. अब तक अमूमन सरकार और आम लोगों के लिए खास नहीं बन सका प्रदूषण का यह मुद्दा, इस इलाके के निवासियों के लिये अब अभिशाप बनता जा रहा है. यहां तक कि प्रदूषित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के नाखून और बालों में भी मरकरी का जहर मिला है. सोनभद्र के बिजली घरों में दो लाख टन से अधिक कोयला जलाया जाता है. ये उसका भी असर है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक कोयला जलाया जाना और उससे उठने वाली गर्मी पारे के प्रदूषण का प्रमुख कारण है.

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लोगों में फैल रही बीमारियां
सोनभद्र के विभिन्न बिजलीघरों में रोजाना दो से ढाई लाख टन कोयला जलाया जाता है. अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) द्वारा किए गए एक ताजा सैम्पलिंग सर्वे के दौरान एकत्रित पर्यावरणीय एवं जैविक नमूनों में मरकरी के खतरनाक स्तरों का खुलासा हुआ है. यहां तक कि प्रदूषित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के नाखून और बालों में भी मरकरी का जहर मिला है. इसके अलावा सर्वे के दायरे में लिए गए करीब 300 किलोमीटर के इलाके में लगे पौधों और मिट्टी में भी मरकरी प्रदूषण की मौजूदगी पाई गई है. एआईआईए के अध्ययन में सर्वे के दायरे में लिए गए ज्यादातर ग्रामीण बेचैनी, याददाश्त की कमी, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, थकान, मतिभ्रम, अनिद्रा, कमजोर और कंपकंपी से ग्रस्त पाए गए हैं. सोनभद्र के गांवों में भूजल के स्रोतों में फ्लोराइड के मिल जाने से प्रभावित लोगों में फ्लूरोसिस जैसी बीमारी भी पनप रही है.

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कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों के विस्तार पर रोक लगाने की हुई थी सिफारिश
जलाए जा रहे कोयले में पारा तथा अन्य नुकसानदेह प्रदूषणकारी तत्व होते हैं और जब उसे कोयला आधारित बिजली संयंत्रों, औद्योगिक ब्वा्यलर और घरों के चूल्हों में जलाया जाता है तो वे तत्व हवा में घुल जाते हैं. पर्यावरणविद् डॉक्टर सीमा जावेद ने बताया कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पूर्व में एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सोनभद्र में औद्योगिकीकरण और कोयला खनन के कारण हुए नुकसान की व्यापकता का आकलन करने के लिये विभिन्न समितियां गठित की थीं. इन समितियों ने वर्ष 2015 और 2017 में दी गई रिपोर्ट में एनजीटी को सलाह दी थी कि सोनभद्र में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों के विस्तार पर रोक लगायी जाए.

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249 से ज्यादा गांव प्रभावित
सिंगरौली की इस विडम्बना को एनजीटी में एक वाद के रूप में पहुंचाने वाले जगत नारायण विश्वकर्मा ने कहा कि हाल के वर्षों में अनेक अध्ययन किए गए और सरकार हम पर मंडरा रहे संकट से पूरी तरह अवगत है, मगर फिर भी प्रदूषण की समस्या को सुलझाने या प्रदूषण फैला रहे बिजली संयंत्रों को बंद करने पर कोई बात नहीं हो रही है. विश्वकर्मा ने बताया कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वर्ष 2009 में ही सिंगरौली को चिंताजनक रूप से प्रदूषित क्षेत्र घोषित किया था और क्षेत्र के 249 से ज्यादा गांव प्रदूषण से प्रभावित घोषित किए गए हैं.