देहरादून: उत्तराखंड राज्य के निर्माण के शुरूआती वर्षों में तत्कालीन ग्राम्य विकास आयुक्त रघुनंदन सहाय टोलिया ने भांग की औद्योगिक खेती की परिकल्पना की थी, जिसके लिए उन्होंने एक शासनादेश जारी करते हुए पॉयलट परियोजना के तौर पर गढ़वाल और कुमांऊ के दूरस्थ क्षेत्रों को भांग उत्पादन के लिए मुफीद बताया था. टोलिया की यह मुहिम हालांकि उस वक्त कारगर नहीं हुई और उनके मुख्य सचिव पद पर आसीन होने के बाद भी इसे खास तवज्जो नहीं मिल पाई.

देश का पहला  राज्य
लेकिन बाद में कांग्रेस नेता हरीश रावत के मुख्यमंत्री बनने पर तत्कालीन सरकार ने औद्योगिक भांग की खेती के प्रयासों को फिर से पंख लगाने की कोशिश की जिसे उनके उत्तराधिकारी और वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मंजिल तक पहुंचाते हुए औद्योगिक भांग की खेती के लिये प्रदेश में एक पॉयलट परियोजना की शुरूआत की है. इस पॉयलट परियोजना के लिए उत्तराखंड सरकार ने भारत में भांग की औद्योगिक खेती का पहला लाइसेंस भारतीय औद्योगिक भांग संघ (आईआईएचए) को दिया है.

निर्मल गंगा: अगले साल मार्च तक 200 घाट, श्मशान घाटों का काम पूरा करने पर जोर

किसानों को होगा तीन गुना मुनाफा
इसके लिये आईआईएचए और उत्तराखंड सरकार के बीच 1100 करोड़ रूपये के एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर दस्तखत किये गये हैं जिसमें अगले पांच वर्षों के दौरान प्रदेश में औद्योगिक भांग की खेती, भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण आदि क्षेत्रों में निवेश किया जाएगा. यह पॉयलट परियोजना पौडी जिले में बिलखेत नामक गांव में शुरू की गयी है जहां साढे़ तीन हैक्टेअर भूमि पर औद्योगिक भांग उगाई जा रही है . उत्तराखंड औद्योगिकी विभाग के पूर्व निदेशक और औद्योगिक भांग के क्षेत्र के विशेषज्ञ बीएस नेगी ने बताया कि औद्योगिक भांग की खेती के वैध हो जाने के बाद इसमें बेहतर मुनाफे की संभावना को देखते हुए बड़ी संख्या में किसान इस ओर आकर्षित होंगे.

इसरो हासिल कर सकता है ‘मानव मिशन’ का लक्ष्य: पूर्व नासा वैज्ञानिक

औद्योगिक भांग के क्षेत्र के विशेषज्ञ नेगी ने बताया कि इस खेती को अपनाने में किसान को काफी फायदा है और यदि किसान इसमें एक रूपया लगाता है तो केवल तीन महीने में उसे तीन रूपये मिल जाते हैं. इसके अलावा, औद्योगिक भांग की फसल ऊसर जमीन पर भी उगाई जा सकती है और जानवर तथा कीट पतंगे भी उसे नुकसान नहीं पहुंचाते हैं. (इनपुट एजेंसी)