लखनऊ: यूपी बोर्ड के स्‍कूलों में अब वैदिक गणित भी पढ़ाया जाएगा. इससे छात्र न केवल जोड़-घटाना सीखेंगे, बल्कि गणित की बड़े महत्‍वपूर्ण सवाल भी मिनटों में सूत्र के जरिये हल करना सीखेंगे. अगले सत्र से इसे लागू कर दिया जाएगा. विद्या भारती ने माध्‍यमिक शिक्षा परिषद को इसका प्रस्‍ताव भेजा था. जिस पर अब सहमति मिल गई है. इसके अलावा इतिहास को सही तरीके से प्रस्‍तुत करने और हमार योद्धाओं जिनकी गाथाएं नहीं हैं, उन्‍हें भी शामिल करने का प्रस्‍ताव है. अब अगले सत्र से जितने भी बदलाव हो जाएंगे उसके बाद संस्‍थान फिर से अन्‍य बदलाव को लागू करने का प्रयास करेगा.

यूपी बोर्ड के लिए वैदिक गणित का पाठ्यक्रम कोई नई बात नहीं है, बल्कि 26 साल बाद वह दोबारा पाठ्यक्रम को जगह देने की तैयारी कर रहा है. माध्यमिक शिक्षा परिषद यानी यूपी बोर्ड ने 1992 में तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार में वैदिक गणित को पाठ्यक्रम में शामिल किया था. इस पाठ्यक्रम को आत्मसात करने की वजह छात्र-छात्रओं को कठिन लगने वाले गणित विषय को आसानी से पढ़ाये जाने की तमाम विधियां रही हैं. असल में वैदिक गणित के जन्मदाता स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ ने ऐसे सूत्र बनाए जिनके जरिये बच्चों को बिना पहाड़ा पढ़े गणित का सवाल हल करने की कला आ जाती है. स्वामी तीर्थ ने सारे सूत्र संस्कृत में लिखे हैं लेकिन, उनमें से अधिकांश हिंदी में भी उपलब्ध हैं. वैदिक गणित में सात विधियों का प्रयोग करके जोड़, घटाना, गुणा और भाग आसानी से किया जा सकता है. इसका सबसे अधिक लाभ प्रतियोगी परीक्षाओं में उठाया जा सकता है.

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वैदिक गणित पढ़ाने के लिए सिलेबस तैयार करने का काम भी पूरा
दावा है कि वैदिक गणित पढ़ाने के लिए सिलेबस तैयार करने का काम भी पूरा हो गया है. जल्‍द ही बाजार में इसकी किताबें भी आ जाएंगी. विद्याभारती की ओर से आयोजित प्रेस वार्ता में संस्‍थान के महासचिव ललित बिहारी गोस्‍वामी ने बताया कि भारतीय शिक्षा प्रणाली पर पड़ी पश्चिमी सभ्‍यता की छाप को दूर करने और राष्‍ट्र केंद्रित शिक्षा प्रणाली लाने के लिए बोर्ड को 32 बिंदुओं का प्रस्‍ताव भेजा था. इसमें वैदिक गणित को बोर्ड ने स्‍वीक़ति कर लिया है.

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वैदिक गणित यूपी बोर्ड के लिए नया नहीं
यूपी बोर्ड ने 70 फीसद हिस्सा सीबीएसई के एनसीईआरटी का किताबों का लिया है, जबकि 30 फीसद पाठ्यक्रम बोर्ड में पहले से संचालित है. इसमें वैदिक गणित को जोड़े जाने की तैयारी है. बोर्ड के सूत्र बताते हैं कि 1992 में यह पाठ्यक्रम जुड़ा था लेकिन, बाद की सरकारों ने इससे किनारा कर लिया, हालांकि छात्र-छात्राओं में इसकी पढ़ाई को लेकर उत्साह रहा है.