लखनऊ: उत्तर प्रदेश का बुंदलेखंड इलाका एक बार फिर सूखे की चपेट में है. तालाब, पोखर सूख गए हैं. बुंदलेखंड की दो सबसे बड़ी नदी केन और बेतवा में भी पर्याप्त पानी नहीं है. अधिकतर जगहों पर नदी सूखी ही दिखती है. पानी चोरी, पानी के लिए झगड़े जैसे मामले सामने आ रहे हैं. पिछली सरकारों ने तलाबों की खुदाई पर जोर दिया. बीजेपी सरकार ने सैकड़ों नए तालाबों की खुदाई की बात कही है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो रहा. ऐसे में सवाल है कि मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के 13 जिलों में फैला बुंदेलखंड का हिस्सा क्या केन और बेतवा जैसी नदियों के गठजोड़ से सूखा रहित हो जाएगा. केंद्र सरकार का मानना है कि नदी जोड़ परियोजना के पूरे होते ही बुंदेलखंड समस्या मुक्त हो जाएगा. केंद्र सरकार ने इसके लिए पहला चरण को शुरू कर दिया हैं. इसकी सफलता देश के 30 नई नदी जोड़ परियोजनाओं की नींव रखेगी. सरकार का कहना है कि यह परियोजना देश से न सिर्फ सूखा और बाढ़ की समस्या को जड़ से खत्म कर देगी, बल्कि जल यातायात के नए अध्याय की शुरूआत भी करेगी. फिर भी सवाल यही है कि इतनी बड़ी परियोजना के बाद क्या पानी की दिक्कतें खत्म हो जाएंगीं. Also Read - UP: स्‍टोन व्यवसायी के मर्डर से जुड़े 5 ऑडियो लीक, IPS, IAS और नेताओं के Nexus का खुलासा

ये हैं फायदे और नुकसान
सरकार का कहना है कि गठजोड़ देश में अकाल की समस्या का स्थाई हल होगा. पूरे देश में लागू होने के बाद 15 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई हो सकेगी. गंगा और ब्रह्मपुत्र आदि बड़ी नदियों के इलाके में हर साल बाढ़ की समस्या से भी निजात मिलेगी, क्योंकि अतिरिक्त पानी को इस्तेमाल करने की एक व्यवस्था मौजूद होगी. इससे 34 हजार मेगावॉट बिजली बनेगी. एमपी व यूपी की सरकारों का दावा है कि यदि नदियां परस्पर जुड़ जाती हैं, तो मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सूखाग्रस्त बुन्देलखण्ड क्षेत्र में रहने वाली 70 लाख आबादी खुशहाल हो जाएगी. बुंदेलखंड की एक लाख 27 हजार हेक्टेयर जमीन सिंचित हो जाएगी. दो जल-विद्युत संयंत्र लगाए जाएंगे. 220 किलोमीटर लम्बी नहरों का जाल बिछाया जाएगा. ये नहरें छतरपुर, टीकमगढ़ और उत्तर प्रदेश के महोबा एवं झांसी जिले से गुजरेंगी, जिनसे 60 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होगी. Also Read - School Reopening: क्‍या यूपी में 21 सितंबर से नहीं खुलेंगे स्कूल?, डिप्‍टी सीएम ने दिया बड़ा बयान

जंगल-जानवरों को होगा नुकसान
वहीं, इसके जबकि, पन्ना राष्ट्रीय उद्यान बाघों के प्रजनन, आहार एवं आवास का अहम वन क्षेत्र है. इसमें करीब दो दर्जन से ज्यादा बाघ बताए जाते हैं. अन्य प्रजातियों के प्राणी भी बड़ी संख्या में यहां रहते हैं. उनके प्रवास को लेकर भी सरकार चुप है. डोढ़न गांव के निकट 9000 हेक्टेयर क्षेत्र में एक बांध बनाया जा रहा है. इसके डूब क्षेत्र में छतरपुर जिले के 12 गांव आएंगे. पांच गांव आंशिक व सात गांव पूर्ण रूप से डूब जाएंगे. इस क्षेत्र के 7,000 लोग प्रभावित व विस्थापित हो जाएगा. Also Read - योगी आदित्यनाथ ने पेंशन के 1,311 करोड़ ऑनलाइन किए ट्रांसफर, इन लाभार्थियों को मिलेगा लाभ

अतीत से लिया जाना चाहिए सबक
यूपी के 16 जिलों से होकर गुजरने वाली शारदा सहायक नहर देश की प्रमुख नहरों में से एक है. इसका निर्माण 2000 में पूरा हुआ, 260 किमी लंबी इस नहर का लक्ष्य 16.77 लाख हेक्टेयर जमीन की सिंचाई करना था. लेकिन, यह सिर्फ 48 फीसदी लक्ष्य हासिल कर पाई है, यानी आधे से भी कम. ऊपर से इससे रिसता पानी अक्सर हजारों हेक्टेयर जमीन में जल-जमाव और सीलन की वजह बन रहा है, जिससे कम पानी वाली गेहूं और दलहन जैसी फसलें बर्बाद हो रही हैं. यही नहीं, शारदा सहायक नहर में तेजी से भरने वाली गाद ने नहर की पानी ले जाने की क्षमता को भी खत्म कर दिया. जिससे आसपास की खेती की जमीन को बंजर बन गई है. इसी तरह से देश में ही कई उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि जब नदियों के पानी की दिशा नहरों के जरिए मोड़ी गई तो उन्होंने आसपास की जमीन को खारा और दलदली बनाते हुए इसका बदला लिया.

पानी को लेकर राज्यों में टकराव
सतलुज-यमुना लिंक नहर का मुद्दा कई दशकों से अदालती पेंच में उलझा हुआ है. 1981 में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच पानी के बंटवारे को लेकर एक समझौता हुआ था. इसके तहत पंजाब को सतलज का पानी बाकी राज्यों के साथ बांटना था, लेकिन बाद में वह इस समझौते से मुकर गया. इसी तरह कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच अंग्रेजों के जमाने से ही कावेरी जल विवाद चला आ रहा है. ऐसे में नदी जोड़ परियोजना में 30 से ज्यादा नदियों को जोड़ने के बाद राज्यों के बीच जल बंटवारे को लेकर जो विवाद होगा, उसकी तो कल्पना ही मुश्किल है.

बुंदेलखंड की सबसे मुख्य बेतवा नदी इस हाल में है.

बुंदेलखंड की सबसे मुख्य बेतवा नदी इस हाल में है.

 

दूसरे देशों का निचोड़, अमेरिका में असफल हो चुकी है ऐसी परियोजनाएं
अमेरिका में कोलैराडो से लेकर मिसीसिपी नदी घाटी तक बड़ी संख्या में बनी ऐसी परियोजनाएं गाद भर जाने के कारण बाढ़ का प्रकोप बढ़ाने लगी और उनसे बिजली का उत्पादन भी धीरे-धीरे गिरता गया. आखिर में इन परियोजनाओं के लिए बने बांध तोड़ने पड़े. गंगा या ब्रह्मपुत्र में हर साल आने वाली गाद की मात्रा मिसीसिपी नदी से दोगुनी है. सोवियत संघ के जमाने में साइबेरियाई नदियों को नहरों के जाल के जरिये कजाकिस्तान और मध्य एशिया की कम पानी वाली नदियों की ओर मोड़ने का काम हुआ था. योजना का मुख्य हिस्सा 2200 किलोमीटर लंबी एक नहर थी. माना जा रहा था कि इससे अनाज का उत्पादन बढ़ जाएगा, लेकिन जहां-जहां भी नहर पहुंची वहां-वहां दलदली जमीन और खारे पानी ने किसानों की कमर तोड़ दी. 80 के दशक में इस योजना को बंद कर दिया गया.

क्या है केन-बेतवा रिवर लिंक परियोजना
केन नदी जबलपुर के पास कैमूर की पहाड़ियों से निकलकर 427 किमी उत्तर की ओर बहने के बाद बांदा जिले में यमुना नदी में जाकर गिरती है. बेतवा नदी मध्य प्रदेश के रायसेन जिले से निकलकर 576 किमी बहने के बाद यूपी के हमीरपुर में यमुना नदी में मिलती है. लगभग 10 हजार करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले केन-बेतवा लिंक में यूपी और एमपी के हिस्से शामिल हैं. इस परियोजना के तहत मध्य प्रदेश से केन नदी के अतिरिक्त पानी को 231 किमी लंबी एक नहर के जरिये यूपी में बेतवा नदी तक लाया जाएगा. परियोजना को पूरा करने के लिए नहरों एवं बांधों के लिए जमीन अधिग्रहण शुरू हो चुका है, इससे डूब क्षेत्र भी तैयार हो रहा है. परियोजना के दूसरे चरण में एमपी चार बांध बनाकर रायसेन और विदिशा जिलों में नहरें बिछाकर सिंचाई का इंतज़ाम करेगा.

कहां है पेच, परियोजना पर उठ रहे ये सवाल
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि केन को बेतवा से जोड़ने के लिए पन्ना के नेशनल पार्क को भारी नुकसान पहुंचेगा. सैकड़ों एकड़ ज़मीन परियोजना में चली जाएगी. हज़ारों पेड़ काट दिए जाएगा. दुर्लभ वन्य जीवों को भारी नुकसान पहुंचेगा. सरकार इसे प्रयोग कह रही है. और प्रयोग सफल होगा या नहीं यह निश्चित नहीं है. केन में बरसात के समय में बाढ़ की स्थिति होती है, लेकिन मार्च से जून में जब बेतवा खाली हो जाती और यूपी के हिस्से के बुंदेलखंड में पानी की भयंकर किल्लत होती है, के दौरान तो केन भी खाली ही होती है. मार्च से जून तक जब केन में ही पानी नहीं होता है तो बेतवा को ये नदी कैसे पानी देगी. केन बेतवा लिंक पर काम कर रहे एनएफआई फेलो प्रदीप श्रीवास्तव का कहना है कि बुंदेलखंड में पर्यावरण परिवर्तन का काफी गहरा प्रभाव पड़ रहा है. ऐसे में पानी को लेकर अगर कोई योजना बनाई जा रही है तो उसमें पर्यावरणीय हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए.