लखनऊ: कैराना लोकसभा उपचुनाव से बीजेपी प्रत्‍याशी मृगांका सिंह दिवंगत सांसद हुकुम सिंह की बेटी हैं. कैराना के पूर्व बीजेपी सांसद हुकुम सिंह के निधन के बाद यह सीट खाली हुई थी. मृगांका सिंह का सीधा मुकाबला राष्ट्रीय लोकदल की प्रत्याशी और पूर्व सांसद तबस्सुम हसन से है. 1962 में सीट के गठन से बाद से ही कैराना चौधरी चरण सिंह और उसके राष्ट्रीय लोकदल का बड़ा गढ़ रहा है. वहीं हुकुम सिंह भी क्षेत्र में बड़े नेता रहे हैं, अब उनकी मौत के बाद मृगांका सिंह के लिए ये चुनाव बड़ी चुनौती है. मृगांका सिंह अपने जुझारूपन के लिए गाजियाबाद से मुजफ्फरनगर तक खासी जान-पहचान रखती हैं. Also Read - राजस्थान सरकार पर मायावती का निशाना, कहा किराया मांगना कंगाली और अमानवीयता का प्रदर्शन

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मृगांका सिंह हुकुम सिंह की सबसे बड़ी बेटी हैं, जो कि 2014 लोकसभा चुनाव के बाद आई सक्रिय राजनीति में आईं. उनकी पहचान एक बिजनेसवुमन, समाजसेविका और शित्राविद की है. 2014 में हुकुम सिंह कैराना लोकसभा से सांसद हुए तो उन्होंने कैराना विधानसभा से इस्तीफा दे दिया. तब उपचुनाव में मृगांका सिंह का नाम सामने आया और माना गया कि अपनी सीट पर हुकुम सिंह बेटी को चुनाव लड़ाएंगे. हालांकि तब टिकट मृगांका सिंह को नहीं बल्कि हुकुम सिंह के भतीजे अनिल सिंह को मिला लेकिन वो सपा उम्मीदवार से चुनाव हार गए. इसके बाद 2017 में मृगांका सिंह को भाजपा से टिकट मिला और वो पहली बार चुनाव लड़ीं, हालांकि तब बीजेपी की लहर के बावजूद वो सपा के नाहिद हसन के चुनाव हार गईं.

चुनाव परिणाम तय करेगा मृगांका का राजनीतिक करियर

हुकुम सिंह की विरासत को संभालने की जिम्मेदारी 59 साल की मृगांका सिंह पर है. उन्‍होंने सात बार विधायक रहे अपने पिता के साथ काफी काम किया है. मृगांका सिंह की चार और बहने हैं लेकिन हुकुम सिंह की राजनीतिक विरासत उनको मिली है. बहनों में सबसे बड़ी मृगांका सिंह को हुकुम सिंह ने खुद 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ाया था. अब मृगांका सिंह के पास पिता की विरासत को संभालने की जिम्मेदारी है, ये चुनाव ही तय करेगा कि उनकी राजनीतिक भविष्य क्या होगा, वो जीतीं तो आगे की राह बनेगी, वहीं हार उनके राजनीतिक करियर के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है. बता दें कि हुकुम सिंह को लोग कैराना और आसपास के क्षेत्र में बाबूजी के नाम से जानते रहे वहीं मृगांका को युवा कार्यकर्ता बुआ जी कहकर बुलाते हैं.

पति की मौत के बाद संभाली जिम्‍मेदारी, पाया मुकाम

मृगांका सिंह ने आर्ट्स में एमए और बीएड की पढ़ाई करने के बाद 1983 में गाजियाबाद के कारोबारी सुनील सिंह से शादी की. ससुराल के लोगों के बहुत खुश ना होते हुए भी अपने ससुर के स्कूल को उन्होंने संभाला और फिर इस क्षेत्र में आगे बढ़ती गई. उन्होंने 200 बच्चों के स्कूल को नई उड़ान दी जब सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा था तो उनकी जदंगी में एक बड़ा हादसा हुआ. 1999 में उनके पति की एक कार दुर्घटना में मौत हो गई. उस वक्त उनकी तीन बेटियां और एक बेटा 13 साल के से कम उम्र के थे. उन्होंने यहां से ना सिर्फ खुद को संभाला बल्कि अपने बच्चों और परिवार को भी संभाला. इतना ही नहीं जो छोटा सा स्कूल उन्हें अपने ससुर से 1987 में मिला उसकी आज पूरी चेन है. देहरादून पब्लिक स्कूल के नाम से उनके गाजियाबाद में चार और मुजफ्फरगनर में एक स्कूल है. इन स्कूलों में करीब 9000 बच्चे पढ़ रहे हैं.