Opinion: कांग्रेस ने राजेंद्र पाल गौतम को क्यों सौंपी यूपी की कमान? सनातन का खुलेआम करते रहे हैं अपमान
उत्तर प्रदेश केवल देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील है. ऐसे में कांग्रेस का यह फैसला आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन सकता है.
कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के प्रभारी के तौर पर अविनाश पांडेय की जगह राजेंद्र पाल गौतम को जिम्मेदारी सौंपी है.
डॉ. संजय कुमार | उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म और जातीय समीकरण हमेशा चुनावी रणनीति के केंद्र में रहे हैं. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दल अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरण साधने में जुटे हैं. इसी बीच कांग्रेस के एक फैसले ने नई बहस छेड़ दी है. पार्टी ने उत्तर प्रदेश के प्रभारी के तौर पर अविनाश पांडेय की जगह राजेंद्र पाल गौतम को जिम्मेदारी सौंपी है. राजेंद्र पाल गौतम आम आदमी पार्टी से कांग्रेस में आए हैं और दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. फिलहाल वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.
राजेंद्र पाल गौतम की नियुक्ति इसलिए चर्चा में है, क्योंकि उनका नाम लंबे समय तक हिंदू देवी-देवताओं और सनातन धर्म को लेकर दिए गए विवादित बयानों के कारण सुर्खियों में रहा है. उनके बयानों पर भाजपा सहित कई हिंदू संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई थी. विवाद इतना बढ़ा था कि उन्हें दिल्ली सरकार में मंत्री पद से इस्तीफा तक देना पड़ा था. ऐसे में उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से सबसे अहम राज्य की जिम्मेदारी उन्हें सौंपे जाने पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
कांग्रेस की बदली रणनीति और नया विरोधाभास
दिलचस्प बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में कांग्रेस लगातार हिंदू और सनातन को लेकर अपनी राजनीतिक छवि बदलने की कोशिश करती दिखाई दी है. खासकर 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी नेतृत्व धार्मिक प्रतीकों और आस्था से जुड़े मुद्दों पर पहले की तुलना में कहीं अधिक सहज और मुखर नजर आया. राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान कई बार भगवान शिव और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं का उल्लेख किया. उन्होंने खुद को शिवभक्त बताया और कई मंदिरों में दर्शन भी किए. कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी धार्मिक आयोजनों में सक्रिय दिखाई दिए. लंबे समय से कांग्रेस उस छवि से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है, जिसमें भाजपा उसे लंबे समय से 'सनातन विरोधी' बताती रही है.
यही वजह है कि कांग्रेस का ताजा फैसला कई सवाल खड़े करता है. एक ओर पार्टी अपनी हिंदू और सनातन को लेकर बनी छवि बदलने का प्रयास कर रही है, तो दूसरी ओर उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य की जिम्मेदारी ऐसे नेता को सौंप रही है, जिनकी पहचान सनातन धर्म पर दिए गए विवादित बयानों से जुड़ी रही है.
राजेंद्र पाल गौतम का विवादों से पुराना नाता
राजेंद्र पाल गौतम का राजनीतिक जीवन विवादों से अछूता नहीं रहा है. दिल्ली सरकार में मंत्री रहते हुए उन्होंने एक सामूहिक धर्मांतरण कार्यक्रम में हिस्सा लिया था, जहां लोगों को हिंदू देवी-देवताओं की पूजा न करने की शपथ दिलाई गई थी. इस कार्यक्रम का वीडियो सामने आने के बाद बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया. बढ़ते दबाव के बीच उन्हें मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा.
कांवड़ यात्रा को लेकर भी विवादों में रहे
इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा था कि लोगों को उन मंदिरों में जाना बंद कर देना चाहिए, जहां महिलाओं के साथ बलात्कार और छेड़छाड़ होती है. उन्होंने दलित समाज के कांवड़ यात्रा में सेवा करने और सनातन शोभा यात्राओं में भाग लेने पर भी सवाल उठाए थे. इन्हीं बयानों को लेकर भाजपा और कई हिंदू संगठनों ने उन पर लगातार निशाना साधा.
कांग्रेस आखिर क्या संदेश देना चाहती है?
राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाए जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांग्रेस इस फैसले के जरिए आखिर क्या संदेश देना चाहती है. यदि पार्टी वास्तव में हिंदू और सनातन को लेकर अपनी राजनीतिक छवि बदलने की दिशा में आगे बढ़ रही है, तो फिर ऐसे नेता को इतनी बड़ी जिम्मेदारी देने का फैसला उस कोशिश के उलट दिखाई देता है. उत्तर प्रदेश केवल देश का सबसे बड़ा राजनीतिक राज्य ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील है. ऐसे में कांग्रेस का यह संगठनात्मक फैसला आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का बड़ा विषय बन सकता है.
सपा के सामने भी असहज सवाल
कांग्रेस के इस फैसले से समाजवादी पार्टी के सामने भी असहज स्थिति पैदा हो सकती है. दोनों दल इंडी गठबंधन के सहयोगी हैं और भविष्य में उत्तर प्रदेश में चुनावी तालमेल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. ऐसे में सवाल यह भी है कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, जो पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर पहले की तुलना में अधिक मुखर दिखाई दे रहे हैं, क्या कांग्रेस के इस फैसले से सहज होंगे? यदि भविष्य में दोनों दल साथ आते हैं, तो भाजपा निश्चित तौर पर इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश करेगी. यही कारण है कि राजेंद्र पाल गौतम की नियुक्ति केवल एक संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की रणनीति और उसके संदेश दोनों पर नए सवाल खड़े करती है.
(लेखक, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं और सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर लेखन करते हैं.)
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