आज अमर रचनाकार मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिन है। हिंदी साहित्य के अमर रचनाकार के जन्मदिन के उत्सव को गूगल भी मना रहा है। गूगल ने मुंशी प्रेमचंद को याद करते हुए आज का डूडल समर्पित किया है। हिंदी साहित्य प्रेमियों के लिए यह गर्व का विषय है। मुंशी प्रेमचंद हिंदी के सबसे लोकप्रिय रचनाकारों में एक माने जाते हैं। उनकी कहानियाँ आम जन-मानस से जु़ड़ी होती हैं इसलिए खूब पसंद की जाती हैं। Also Read - New Year's Eve 2021 Google Doodle: नव वर्ष की पूर्व संध्या पर गूगल का खूबसूरत संदेश- घर में रहिए और....

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प्रेमचन्द का जन्म ३१ जुलाई सन् १८८० को बनारस शहर से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम अजायब राय था। वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे। धनपतराय की उम्र जब केवल आठ साल की थी तो माता के स्वर्गवास हो जाने के बाद से अपने जीवन के अन्त तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना धनपतराय को करना पड़ा। पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण बालक प्रेम व स्नेह को चाहते हुए भी ना पा सका। आपका जीवन गरीबी में ही पला। कहा जाता है कि आपके घर में भयंकर गरीबी थी। पहनने के लिए कपड़े न होते थे और न ही खाने के लिए पर्याप्त भोजन मिलता था। इन सबके अलावा घर में सौतेली माँ का व्यवहार भी हालत को खस्ता करने वाला था।

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प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपतराय था। प्रेमचन्द ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नयाबराय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम ने पहली बार प्रेमचन्द नाम सुझाया। यहीं से धनपतराय हमेशा के लिए प्रेमचन्द हो गये। “सेवा सदन”, “मिल मजदूर” तथा १९३५ में गोदान की रचना की। गोदान आपकी समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा मशहूर हुई अपनी जिन्दगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना आरंभ किया। दुर्भाग्यवश मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये। इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूँजीवादी युग प्रवृत्ति की निन्दा करते हुए “महाजनी सभ्यता” नाम से एक लेख भी लिखा था।

सन् १९३६ ई० में प्रेमचन्द बीमार रहने लगे। अपने इस बीमार काल में ही आपने “प्रगतिशील लेखक संघ” की स्थापना में सहयोग दिया। आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण ८ अक्टूबर १९३६ में आपका देहान्त हो गया। और इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया।

नमक का दरोगा, सौत, आभूषण, प्रायश्चित, कामना, मंदिर और मस्जिद, सत्याग्रह, सती जैसी उनकी कहानियाँ खूब लोकप्रिय हुईँ। उनकी कई कहानियाँ आज भी स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल हैं। उनके जन्मदिवस पर पूरा हिंदी साहित्य उन्हें शत शत नमन करता है।