केरल की मंजू कुट्टीकृष्णन चेहरे व शरीर पर सफेद दाग की वजह से समाज में सौंदर्य के प्रचलित मानकों को कभी पूरा नहीं कर पाईं, लेकिन आज वह उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत है जो अपनी शारीरिक बनावट की वजह हीन भावना का शिकार रहे हैं.

मंजू देश की पहली ‘ल्यूकोडर्मा मॉडल’ हैं और त्वचा के अलग रंग के बावजूद मॉडलिंग कर रही हैं.

ल्यूकोडर्मा या विटिलिगो चर्मरोग का एक प्रकार है, जिसमें त्वचा अपना प्राकृतिक रंग खो देती है और शरीर पर सफेद दाग उभर आते हैं.

नामचीन मेकअप कलाकार जसीना कदाविल ने अपने यूट्यूब चैनल ‘कैटेलिस्ट स्कॉलर’ पर मंजू को पेश करते हुए एक वीडियो डाला है जिसका उद्देश्य इस प्रकार की त्वचा वाले लोगों के मन से हीन भावना को निकालना है.

मंजू का यह वीडियो आते ही वायरल हो गया है.

ल्यूकोडर्मा के कारण त्वचा का रंग खो चुकी एक परेशान युवती से आज वह एक ऐसी शख्सियत बन गई हैं जिनसे लोग प्रेरणा लेते हैं और उनके भीतर सकारात्मक सोच विकसित होती है.

मंजू ने भाषा से कहा, “हम समाज की प्रचलित मान्यताओं को एक दिन में नहीं बदल सकते, विशेषकर सौंदर्य के संदर्भ में. लेकिन बदलाव हमेशा छोटे कदम से होता है. मेरा प्रयास है कि ऐसे ही छोटे कदम उठा कर मान्यताओं को बदल सकूं.”

पेशे से पत्रकार मंजू ने कहा कि जब जसीना ने यूट्यूब चैनल के लिए उनसे संपर्क किया तब उन्हें आश्चर्य हुआ.

उन्होंने कहा, “मेरी पहली प्रतिक्रिया यह थी कि उन्होंने मुझे क्यों चुना. लेकिन जसीना ने सारी शंकाओं को दूर कर दिया. उन्होंने कहा कि सभी एक प्रकार से सुंदर होते हैं समाज को उसे जानना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि यदि मेरे फोटोशूट और कहानी से इसी परिस्थिति से गुजर रहे किसी अन्य व्यक्ति को प्रेरणा मिल सकती है तो यह बड़ा कदम होगा.”

जसीना ने अपनी फोटोशूट श्रृंखला में सौंदर्य की प्रचलित मान्यताओं को तोड़ने के उद्देश्य से कई साधारण युवतियों को मॉडल के तौर पर पेश किया है. फोटोशूट में 42 वर्षीय मंजू को कई रंग बिरंगे परिधानों में देखा जा सकता है.

मंजू ने कहा कि वह अपने पहले फोटोशूट को लेकर तनाव में नहीं थी, लेकिन ऐसे लोगों के प्रति समाज के नजरिये ने उन्हें बचपन से ही अनेक बार परेशान किया.

मंजू ने बताया कि जब उनकी शिक्षिका ने अन्य छात्रों को उनके साथ यह कह कर खेलने से मना किया कि मंजू का रोग संक्रामक है, तब मंजू को बहुत बुरा लगा. मंजू को ऐसे भी लोग मिले जो उन्हें ‘पेंडन डॉग’ कह कर चिढ़ाते थे.

इस प्रकार के भेदभाव के कारण कुछ स्थानों पर उन्हें खुद को समाज से अलग करने पर मजबूर होना पड़ा.

हालांकि मंजू के पिता ने हमेशा उनका सहयोग किया और पत्रकारिता के पेशे से संबंधित लोगों ने त्वचा के रंग को लेकर कभी उनके साथ भेदभाव नहीं किया.

मंजू ने कहा, “जो लोग समाज की स्थापित मान्यताओं से अलग जाते हैं समाज उन्हें पृथक कर देता है. आप मुझसे पूछेंगे कि असली सौंदर्य क्या है तो मैं कहूंगी कि मानसिक शांति असली सौंदर्य है.”

मंजू ने यह भी कहा कि फोटोशूट ने उन्हें और अधिक जिम्मेदार बनाया है और उन्हें आत्मविश्वास से भर दिया है.
(एजेंसी से इनपुट)