Raksha Bandhan 2020: रक्षाबंधन के त्योहार को भाई-बहनों के प्रेम और सुरक्षा की कसमें खाने के पर्व के रूप में जाना जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि एक गांव ऐसा भी है जहां बहनें इस त्योहार पर भाइयों को राखी नहीं बांधती.Also Read - ऐसी कौन सी नौबत आ गई जो भोजपुरी एक्ट्रेस गुंजन पंत को यूपी में बेचनी पड़ी चूड़ियां, ठेला चलाती गलियों में आईं नज़र

ये गांव है गोंडा जिले के वजीरगंज विकासखंड के ग्राम पंचायत डुमरियाडीह का भीखमपुर जगतपुरवा. यहां पर्व मनाना तो दूर कोई इसका जिक्र करना भी पसंद नहीं करता. ऐसा करने पर सभी लोगों की आंखों के सामने पूर्व घटित हुई घटनाएं आ जाती हैं और उन्हें इस पर्व से दूरी बनाए रखने को आगाह करती हैं. Also Read - यूपी में उद्योगों को लगेंगे पंख, बिग-अल्फा और एमएसएमई स्टार्टअप फोरम के बीच हुआ करार

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के जगतपुरवा में 20 ऐसे घर हैं, जिनमें करीब 200 बच्चे, बूढ़े व नौजवान भाई रक्षासूत्र का नाम सुनकर ही सिहर उठते हैं. ग्राम पंचायत डुमरियाडीह की राजस्व गांव भीखमपुर जगतपुरवा घरों में आजादी के 8 सालों के बाद करीब पांच दशक से अधिक बीत जाने के बाद बहनों ने अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र नहीं बांधा है. Also Read - UP Elections 2022: BJP ने पहली ही लिस्‍ट में दिखाया OBC मैनेजमेंट, विरोधियों के आरोपों का क्‍या हुआ?

यहां तक कि आसपास के गांव पहुंचे, यहां के बाशिंदे रक्षाबंधन के दिन जब सिर्फ अपने गांव का नाम बताते हैं और वहां की बहनें उन्हें रखी बांधने से खुद माना कर देतीं हैं.

इधर, जगतपुरवा के नौजवानों के मन मे इस त्योहार को लेकर उल्लास तो रहता है लेकिन पूर्वजों की बनाई परंपरा को न तोडना ही ही इनका मकसद बन चुका है.

जगतपुरवा निवासी डुमरियाडीह ग्राम पंचायत की मुखिया ऊषा मिश्रा के पति सूर्यनारायण मिश्र के अलावा ग्रामीण सत्यनारायण मिश्र, सिद्घनारायन मिश्र, अयोध्या प्रसाद, दीप नारायण मिश्र, बाल गोविंद मिश्र, संतोष मिश्र, देवनारायण मिश्र, धुव्र नारायण मिश्रा और स्वामीनाथ मिश्र ने बताया कि बहनों ने जब कभी हमारे घरों में अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधे, तब-तब इस गांव में अनहोनी हुई.

बकौल सूर्यनारायण मिश्रा, ‘आजादी के आठ साल बाद करीब 5 दशक पहले (1955) में रक्षाबंधन के दिन सुबह हमारे परिवार के पूर्वज में एक नौजवान की मौत हो गई थी. तब से इस गांव में बहनें अपने भाईयों की कलाई पर रक्षासूत्र नहीं बांधतीं हैं. एक दशक पूर्व रक्षाबंधन के दिन बहनों के आग्रह पर रक्षासूत्र बंधवाने का निर्णय लिया गया था, लेकर उस दिन भी कुछ अनहोनी हुई थी. इसके बाद ऐसा करने की किसी की हिम्मत नहीं हुई. आज भी यही भय, बहनों को अपने भाइयों को कलाई पर रक्षासूत्र बांधने से रोकती है.’

सूर्य नारायण ने बताया कि रक्षा बंधन वाले दिन अगर इस कुल में कोई बच्चा जन्म लेगा, तभी त्यौहार मनाया जाएगा. इसका इंतजार करीब तीन पीढ़ियों से चल रहा है, अभी तक यह अवसर आया नहीं है.

उन्होंने बताया कि जगतपुरवा गांव में भले ही रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाया जाता है, लेकिन आसपास के गांवों की बहनें अपने भाईयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं. बावजूद इसके जगतपुरवा गांव के भाई-बहनों में जरा भी निराशा नहीं है. कहते हैं कि जो बड़ो ने बताया, उसी पर अमल करते हैं. अपने पूर्वजों द्वारा शुरू की गई परंपरा को नहीं तोड़ेंगे. परंपरा को निभाते रहेंगे.

सूर्यनरायण मिश्रा ने बताया कि रक्षा सूत्र के बंधन सिर्फ सुनते हैं, लेकिन उसका आनन्द नहीं उठा पाते हैं. रक्षाबंधन के दिन अगर यह 20 घर के लोग आसपास के किसी दूसरे गांव में जाते हैं तो सिर्फ जगतपुरवा निवासी कहने पर बहनें रक्षासूत्र नहीं बांधती.

दूसरे को देखकर रक्षा सूत्र में बंधे रहने का मन हर किसी को करता है. लेकिन, गांव की परंपरा की जब याद आती है तो लोग स्वत: ही रक्षा सूत्र नहीं बंधवाते.

ग्रामीणों ने बताया कि रक्षा सूत्र के दिन इस गांव के अधिकांश लोग गांव से बाहर नहीं जाते. जगतपुरवा गांव रक्षा सूत्र के दिन सन्नाटा रहता है.