जन्माष्टमी का त्यौहार आ गया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में कई दिनों से इस त्यौहार के लिए तैयारियां चल रही हैं। मथुरा-वृंदावन में रासलीलाओं का आयोजन किया जा रहा है तो दूसरी जगहों पर भगवान कृष्ण के जीवन से जुड़ी झांकियां तैयार की गई है। लेकिन सबसे ज्यादा इस त्यौहार पर उमंग दही हांडी की रहती है। पूरे महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में जन्माष्टमी के दिन दही-हांडी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। लेकिन कभी आपने सोचा है कि जन्माष्टमी और दही-हांडी में आख़िर क्या रिश्ता है? क्यों इस दिन महाराष्ट्र के कोने-कोने में लगभर हर इलाके में इसकी प्रतियोगिता की जाती है जिसमें सैंकड़ों लोग शामिल होते हैं? हम आपको इसी की रोचक जानकारी दे रहे हैं।Also Read - Maharashtra News: मुख्यमंत्री आवास के नजदीक दही हांडी तोड़ने पर MNS उपाध्यक्ष के खिलाफ मामला दर्ज...

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क्या है दही-हांडी आयोजन Also Read - Janmashtami पर सीएम योगी का बड़ा फैसला- मथुरा समेत इन 7 स्थानों पर नहीं बिकेगी शराब, मांस की बिक्री भी बैन

दही-हांडी की प्रतियोगिताओं में एक ऊंचाई पर दही की हांडी लटकाई जाती है। मानव पिरामिड बनाया जाता है, और उस पिरामिड में जो सबसे ऊंचाई पर होता है वो इस दही की हांडी को फोड़ता है। इस दौरान संगीत का इंतज़ाम भी किया जाता है और लोग पिरामिड बनाने वालों पर पानी फेंककर उनका काम मुश्किल बनाने की कोशिश भी करते हैं। अमूमन इन प्रतियोगिताओं में लड़के गोविंदा बनकर हिस्सा लेते हैं लेकिन पिछले कुछ सालों से लड़कियों ने भी अपने ग्रुप बनाकर इन प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया है। इसे भी पढ़ें – जन्माष्टमी 2016: पूजा और व्रत करने का सही समय और मुहूर्त

दही-हांडी से करते हैं कृष्ण को याद

हम सभी ने पौराणिक कथाओं में सुना है कि बाल कृष्ण दही की हांडी से दही और मक्खन चुराकर खाते थे। इसी वजह से उनके जन्मदिन पर ये परंपरा चल पड़ी कि दही-हांडी का खेल खेला जाने लगा। ऐसा करके लोग भगवान कृष्ण को याद करते हैं। ये खेल उनके जन्मदिन का उत्सव मनाने का एक तरीका है।

गोविंदाओं पर पानी फेंकने की परंपरा

पौराणिक कथाओं में आपने ये भी सुना होगा कि जब-जब भगवान कृष्ण गोकुल के घरों की मटकियां फोड़ते थे, वो लोग परेशान हो जाते थे। उन्हें रोकने की कोशिश की जाती थी। इसी को याद करते हुए दही-हांडी प्रतियोगिताओं में जब गोविंदा हांडी फोड़ने की कोशिश करते हैं तो गोकुलवासियों की तरह ही लोग उन्हें रोकने की कोशिश करते हैं, जिसके लिए वो उनपर पानी फेंकते हैं। इसे भी पढ़ें – जन्माष्टमी विशेषः श्री कृष्ण के जन्म की रात के वो तीन पहर

आख़िर में होती है मेहनत की जीत

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई उपदेश दिये थे जिनमें से एक ये भी था कि अगर आपका लक्ष्य निश्चित हो और आप मेहनत व हिम्मत दिखाएं तो हर मुश्किल आसान हो जाती है। दही-हांडी प्रतियोगिता असल में इसी उपदेश पर आधारित है। ये प्रतियोगिता आसान नहीं है, ऊंचा पिरामिड बनाना बहुत मुश्किल होता है। उसमें मेहनत और हिम्मत दोनों लगती है। असली गोविंदा तो वही होता है जो आखिर तक हार नहीं मानता, खूब कोशिश करता है। साथ ही ढेर सारी मेहनत भी करता है, कोशिश भी करता है। इसी के बाद उसे जीत हासिल होती है।

उम्मीद है, अब आपको ये सवाल परेशान नहीं करेगा कि जन्माष्टमी में आख़िर दही हांडी की प्रतियोगिताओं का आयोजन क्यों किया जाता है। कम शब्दों में कहा जाए तो ये भगवान श्रीकृष्ण और उनके महान जीवन को याद करने का एक तरीका भर है।